याचिका में कहा गया है इसलिए, तलाक-ए-हसन की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकार के साथ हस्तक्षेप करती है। उक्त अधिकार को केवल एक न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और उचित कानून द्वारा ही छीना जा सकता है, जिसका वर्तमान मामले में अभाव है।
याची ने तलाक-ए-हसन को चुनौती देने के अलावा याचिका में निर्देश के लिए प्रार्थना की गई है कि सभी धार्मिक समूह, निकाय और नेता जो इस तरह की प्रथाओं की अनुमति और प्रचार करते हैं, उन्हें याचिकाकर्ता को सरिया कानून के अनुसार कार्य करने और तलाक-ए-हसन को स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। याची ने सभी धार्मिक समूहों, निकायों और नेताओं से सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस को निर्देश देने का आग्रह किया गया है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि यह प्रथा भेदभावपूर्ण है क्योंकि केवल पुरुष ही इसका प्रयोग कर सकते हैं, यह प्रथा असंवैधानिक है क्योंकि यह मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह इस्लामी आस्था का एक अनिवार्य अभ्यास नहीं है।