नींद भी होती है प्रभावित
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे जल्दी ही चिड़चिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगते हैं। स्क्रीन पर दिखने वाली तेज रोशनी और लगातार बदलती तस्वीरें दिमाग को जरूरत से ज्यादा प्रभावित करती हैं, जिससे नींद की समस्या भी बढ़ रही है। पढ़ाई, मनोरंजन, जानकारी और संवाद जैसी हर जरूरत के लिए स्क्रीन का सहारा लेना आम बात हो गई है। ऑनलाइन कक्षाओं, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और कार्टून देखने के चलते बच्चों का स्क्रीन टाइम तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों की आंखों और दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव उनके व्यवहार पर देखने को मिलता है।
तकनीक संग संतुलन बनाना जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि अगर बच्चे में लंबे समय तक गुस्सा, चिड़चिड़ापन, नींद न आना, पढ़ाई में गिरावट या व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, तो इसे नजरअंदाज न करें। समय रहते मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने से बड़ी परेशानी से बचा जा सकता है। तकनीक से दूरी संभव नहीं है, लेकिन सही संतुलन बच्चों को स्वस्थ और खुश रखने में अहम भूमिका निभाता है।
डॉक्टर की राय
मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ मनोचिकित्सक मेडिकल डिप्टी सुपरिटेंडेंट डॉ. ओमप्रकाश ने बताया कि आज के समय में मोबाइल और लैपटॉप बच्चों की पढ़ाई और मनोरंजन का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। माता-पिता बच्चों में चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, नींद की परेशानी और सामाजिक दूरी जैसे बदलाव महसूस कर रहे हैं। इस स्थिति में घबराने के बजाय संतुलित और समझदारी भरा कदम जरूरी है।
केस स्टडी एकः पढ़ाई के साथ बढ़ता स्क्रीन टाइम, बदलता व्यवहार
पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद के रहने वाले व जाफराबाद में ही स्थित एक प्राइवेट स्कूल में 7वीं कक्षा के छात्र के माता-पिता पहले अपने बेटे को पढ़ाई में ठीक और स्वभाव से शांत बताते थे। ऑनलाइन क्लास शुरू होने के बाद धीरे-धीरे बच्चे का स्क्रीन टाइम बढ़ता गया। पढ़ाई के अलावा वह मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने लगा। कुछ महीनों बाद माता-पिता ने नोटिस किया कि बच्चा छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ा हो जाता है, बात काटने लगा है और रात में देर से सोता है।
स्कूल से शिकायत आने लगी कि बच्चा क्लास में ध्यान नहीं देता और जल्दी थक जाता है। जांच में कोई शारीरिक समस्या नहीं पाई गई। काउंसलिंग के दौरान यह साफ हुआ कि बच्चा दिन में कई घंटे स्क्रीन पर बिताता है और उसका नींद और जागने का संतुलन बिगड़ चुका है। परिवार को स्क्रीन टाइम सीमित करने, सोने से पहले मोबाइल पूरी तरह बंद रखने और रोज बाहर खेलने की सलाह दी गई। करीब एक महीने में बच्चे की नींद, ध्यान और व्यवहार में स्पष्ट सुधार देखा गया।
केस स्टडी दोः मोबाइल से दूरी पर गुस्सा और भावनात्मक खिंचाव
पूर्वी दिल्ली के सभापुर निवासी छठी कक्षा की छात्रा को उसके माता-पिता उसे अस्पताल इसलिए लेकर आए क्योंकि वह अब अकेले रहना पसंद करने लगी थी। बातचीत कम हो गई थी और मोबाइल हटाने पर रोने या गुस्सा करने लगती थी। पहले वह दोस्तों के साथ खेलती थी, लेकिन धीरे-धीरे वह अधिक समय सोशल मीडिया और रील्स देखने में लगाने लगी।
माता-पिता को लगा कि यह उम्र का असर है, लेकिन समय के साथ बच्ची में आत्मविश्वास की कमी, उदासी और पढ़ाई में अरुचि दिखने लगी। काउंसलिंग में सामने आया कि बच्ची स्क्रीन पर मिलने वाली त्वरित संतुष्टि की आदी हो गई थी और असल दुनिया से कटाव महसूस कर रही थी।
परिवार को सलाह दी गई कि स्क्रीन अचानक न छीनी जाए, बल्कि धीरे-धीरे समय कम किया जाए, रोज परिवार के साथ बातचीत का समय तय किया जाए और बच्ची को कला व खेल जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाए। कुछ ही हफ्तों में बच्ची का व्यवहार अधिक संतुलित और भावनात्मक रूप से स्थिर होने लगा।