नोएडा (संजय शिशौदिया)। बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए लखनऊ से नियम बदले जाते थे, लेकिन पूरा खेल नोएडा की जमीन के लिए खेला जाता था। नोएडा के बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए सभी नियम और कायदे-कानूनों को ताक पर रख दिया गया। अब सुपरटेक के ट्विन टावर प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद शासन स्तर से एसआईटी का गठन किया गया है।
खरीदार भी दबी जुबान में यह बात करने लगे हैं कि आखिर बिल्डरों पर इतनी मेहरबानी किसके इशारे पर हुई। इस खेल में न केवल प्राधिकरणों को करोड़ों का नुकसान बिल्डरों ने पहुंचाया, बल्कि खरीदरों के करोड़ों रुपये लेकर बिल्डर चंपत भी हो गए। जबकि किसी खरीदार ने जीवन की पूरी कमाई आशियाने की आस में लगा दी तो किसी ने बैंक से मोटा कर्ज भी ले लिया। आशियाना तो नहीं मिला अलबत्ता जीवन भर की कमाई गंवाने के साथ-साथ ऐसे लोग अब बैंक किश्त भी जमा करने को मजबूर हैं। खरीदारों का कहना है कि अब एसआईटी जांच से उन्हें यह उम्मीद है कि भ्रष्टाचार की जो बात चली है, वह अब दूर तक जाएगी।
30% से 10% करते ही बिल्डरों ने खरीदी अंधाधुंध जमीन
खरीदारों का कहना है कि बिल्डर लॉबी की सहायता के लिए लखनऊ से नियम बदले गए। इनमें मुख्य रूप से दो नियम ऐसे थे, जिनके लागू होने के बाद बिल्डरों ने दोनों हाथों से प्राधिकरण को लूटने का काम किया। पहले प्राधिकरण किसी भी बिल्डर से जमीन आवंटन के दौरान ही जमीन की कुल कीमत का 30 फीसदी वसूल कर लेता था। इसके बाद उसे एक साल की मोहलत दी जाती थी। बिल्डर को जमीन पर अपना प्रोजेक्ट लांच करने और बाकी कीमत चुकाने के लिए एक साल का समय दिया जाता था। बसपा सरकार में अचानक ही बिल्डरों के लिए 30 फीसदी की जगह 10 फीसदी जमा कराने का नियम बन गया। इस पर बिल्डरों ने दोनों हाथों से प्राधिकरण की जमीन बटोरनी शुरू कर दी। पहले जहां बिल्डर दस हजार वर्ग मीटर जमीन खरीदता था। वहीं, नए नियम के बाद बिल्डर 30 हजार वर्ग मीटर जमीन खरीदने लगा, क्योंकि उसे तीन गुना जमीन के लिए भी उतनी ही रकम प्राधिकरण को देनी होती थी, जितना वह पहले मात्र 10 हजार वर्गमीटर जमीन के लिए भुगतान करता था।
बकाया भुगतान के लिए भी एक की जगह दी गई दो साल की मोहलत
लखनऊ से हुआ दूसरा नियम यह बना कि बकाया रकम का भुगतान पहले जहां बिल्डर को मात्र एक साल के अंदर करना होता था, उसी भुगतान के लिए बिल्डर को अब दो साल की मोहलत दी गई। ऐसे में बिल्डर ने प्राधिकरण से ज्यादा से ज्यादा जगह खरीदी। अपने प्रोजेक्ट लांच किए और प्री बुकिंग के नाम पर ही बायर्स से करोड़ों बटोर लिए। बिल्डर ने बायर्स के इन पैसों को प्रोजेक्ट में न लगाकर अन्य प्रोजेक्ट के लिए जमीन खरीदने में लगा दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि बिल्डर न तो बायर्स के लिए आशियाने तैयार कर पाए और न ही प्राधिकरण का बकाया भुगतान कर पाए। ऐसे में रातों-रात अर्श को छूने वाले बिल्डर फर्श पर आ गए। बायर्स के पैसे तो फंसे ही प्राधिकरण की जमीन के भी हजारों करोड़ इन बिल्डर्स पर फंस गए।