उच्च प्राथमिक स्कूल डाढ़ा की शिक्षिका रचना ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा, जल चक्र और स्वच्छता जैसे विषयों को रोचक तरीके से बच्चे मॉडल से समझा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पुरानी प्लास्टिक की बोतल से जल संरक्षण का मॉडल, गत्ते से घर और सड़क की संरचना तथा बेकार सामग्री से तैयार मशीनों के नमूने बच्चों को विज्ञान के सिद्धांत समझने में मदद कर रहे हैं।
प्रतिभा किसी महंगे उपकरण या बड़े संसाधन की मोहताज नहीं होती। इसे साबित कर रहे हैं परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले नौनिहाल, जो अपनी रचनात्मकता और मेहनत से साधारण वस्तुओं को उपयोगी शिक्षण सामग्री में बदल रहे हैं। कहीं पुराने गत्ते और बोतलों से विज्ञान के मॉडल तैयार किए जा रहे हैं, तो कहीं रंगीन कागज, लकड़ी की तीलियों और घरेलू सामान की मदद से गणित के कठिन सवालों को आसान बनाया जा रहा है। बच्चों की यह रचनात्मक पहल पढ़ाई को किताबों से बाहर निकालकर प्रयोग और अनुभव से जोड़ने का माध्यम बन रही है।
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उच्च प्राथमिक स्कूल डाढ़ा की शिक्षिका रचना ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण, वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा, जल चक्र और स्वच्छता जैसे विषयों को रोचक तरीके से बच्चे मॉडल से समझा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पुरानी प्लास्टिक की बोतल से जल संरक्षण का मॉडल, गत्ते से घर और सड़क की संरचना तथा बेकार सामग्री से तैयार मशीनों के नमूने बच्चों को विज्ञान के सिद्धांत समझने में मदद कर रहे हैं। ऐसे प्रयोगों से उनमें चीजों को केवल देखने के बजाय उनके काम करने के तरीके को जानने की जिज्ञासा बढ़ी हैं। प्राथमिक स्कूल नवादा की प्रधानाचार्य गीता यादव ने बताया कि बच्चे करके और तेजी से सीख रहे हैं। उन्होंने बताया कि मॉडल से बच्चों की सीखने की कला बढ़ी है।
गणित की मुश्किलें भी हो रही हैं आसान
छात्रा सनित व शिवम ने बताया कि गणित को अक्सर कठिन विषय माना जाता है, लेकिन जबसे खेल-खेल में सीखने की कोशिश की है। विषय सरल लगने लगा है। संख्याओं और गणनाओं को समझना आसान हो गया है। जोड़-घटाव के चार्ट, पहेलियां, ज्यामितीय आकृतियां और संख्या रेखा जैसे मॉडल विषय की बुनियादी अवधारणाएं समझने में मदद कर रहे हैं। वहीं उच्च प्राथमिक स्कूल पर्थला खंजरपुर की शिक्षिका
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अर्चना पांडेय ने बताया कि चित्रकला और पर्यावरण संबंधी प्रोजेक्ट के जरिए बच्चे जल बचाने, पेड़-पौधों की रक्षा, कचरे के सही निस्तारण और स्वच्छता का महत्व समझ रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रोजेक्ट तैयार करने के दौरान बच्चों को योजना बनाने, सामग्री जुटाने, गलतियों से सीखने और अपने मॉडल के बारे में दूसरों को समझाने का अवसर मिलता है। समूह में काम करने से उनमें सहयोग, जिम्मेदारी और संवाद कौशल विकसित होते हैं। शिक्षकों का मार्गदर्शन इन प्रयासों को सही दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अब केवल किताबों तक ज्ञान ही सीमित नहीं है। बच्चों को मॉडल व प्रोजेक्ट बनाना सिखाया जा रहा है। हाल ही में एक बच्चे के प्रोजेक्ट ने मुंबई में दूसरा स्थान हासिल किया है। - राहुल पंवार, बीएसए