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वंदे मातरम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान भ्रामक : मदनी

Mon, 10 Nov 2025 12:47 AM IST
नोएडा ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, नोएडा
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बोले- स्कूलों में इसे अनिवार्य करना मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन
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फोटो समाचार
संवाद न्यूज एजेंसी
देवबंद(सहारनपुर)। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष व पूर्व राज्यसभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने वंदे मातरम के कुछ अंश हटाने को विभाजन से जोड़ने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को भ्रामक करार दिया।
मौलाना महमूद मदनी ने जारी बयान में कहा कि सरकारी और गैर-सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों एवं अभिभावकों को वंदे मातरम गाने और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भेजने के निर्देश दिए गए हैं। यह निर्देश संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है।
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उन्होंने बयान की आलोचना करते हुए कहा कि वंदे मातरम एक ऐसी रचना है, जो पूरी तरह शिर्किया अकायद (अल्लाह के सिवा किसी दूसरी चीज को पूजना) पर आधारित है। इसमें विशेष रूप से इसके शेष चार पदों में मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में प्रस्तुत कर उसकी पूजा के शब्दों का प्रयोग किया गया है।
चूंकि मुसलमान एक ईश्वर को मानते हैं और केवल उसी की पूजा करते हैं। इसलिए किसी भी मुसलमान के लिए ऐसे गीत का गायन उसके धार्मिक विश्वास के प्रतिकूल है। मौलाना मदनी ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) देता है।
इन सांविधानिक अधिकारों के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी आस्था या अंतरात्मा के विरुद्ध कोई नारा, गीत या विचार स्वीकार करने या गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर स्पष्ट निर्णय दिया है।
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मौलाना मदनी ने वंदे मातरम पर दिया तर्क
मौलाना महमूद मदनी ने तर्क देते हुए कहा कि 26 अक्टूबर 1937 को गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र में सलाह दी थी कि वंदे मातरम के केवल पहले दो पंक्ति को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जाए। क्योंकि शेष पद एकेश्वरवादी धर्मों की आस्थाओं से टकराते हैं। इसी सलाह के आधार पर 29 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने निर्णय लिया कि केवल दो पदों को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी जाएगी।
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