- 2026 के बजट में जिले के लोगों को मिली निराशा, कब बजेगी मेवात में रेल की सीटी
फोटो- रेल का फाइल फोटो।
रिजवान खान
नूंह। राजधानी दिल्ली से महज 70 किलोमीटर दूर बसे नूंह जिले के लिए रेलवे आज भी एक सपना ही बना हुआ है। फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे विकसित जिलों से सटे होने के बावजूद नूंह जिले को आज़ादी के 78+ साल बाद भी रेल सुविधा नसीब नहीं हो पाई। हर चुनाव में राजनीतिक दल रेलवे लाइन से जोड़ने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही ये वादे फाइलों में दबकर रह जाते हैं।
- रेल का इंतज़ार, दशकों से अधूरा सपना
नूंह जिले के सात ब्लॉक खंडों में रहने वाली करीब 17 लाख की आबादी आज भी सड़क परिवहन पर निर्भर है। हालत यह है कि जिले की करीब 70 फीसदी आबादी ने रेल देखी तक नहीं है, उसमें सफर करना तो दूर की बात है। बस सेवाएं भी पर्याप्त नहीं होने के कारण लोगों को शिक्षा, रोजगार और इलाज के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
- सर्वे हुए, नतीजा शून्य
रेलवे को नूंह से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार दो बार सर्वे करा चुकी है। वर्ष 2006 में फरीदाबाद–अलवर रेल लाइन के लिए सर्वे हुआ, जबकि इससे पहले 1985 में रेवाड़ी–अलीगढ़ रेल मार्ग का सर्वे किया गया था। लेकिन दोनों ही योजनाएं आज तक कागजों से बाहर नहीं आ सकीं। रेल भवन में ये फाइलें अब भी धूल फांक रही हैं।
-बजट में फिर टूटीं उम्मीदें
पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल द्वारा हरियाणा में सात नए रेल मार्गों के सर्वे की घोषणा की गई, जिसमें अलवर–दिल्ली होते हुए सोहना–नूंह को जोड़ने की बात कही गई। इससे जिले के लोगों को बड़ी उम्मीद जगी थी कि इस बार रेल बजट में नूंह को सौगात मिलेगी, लेकिन बजट आते ही एक बार फिर निराशा हाथ लगी।
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बोले लोग
हर चुनाव में नेता आते हैं, रेल का सपना दिखाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। अब भरोसा उठता जा रहा है।
- तौसीफ खान, समाजसेवी।
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जिले के बच्चों को पढ़ाई के लिए गुरुग्राम-दिल्ली जाना पड़ता है। अगर रेल होती तो समय और पैसे दोनों बचते।
- अरशद खान, अधिवक्ता।
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इलाज के लिए बड़े शहर जाना मुश्किल हो जाता है। महिलाओं और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी होती है।
- जुबेर सरपंच, हथनगांव।
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रेल नहीं होने से व्यापार पिछड़ रहा है। नूंह आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है।
- रशीद अहमद, अधिवक्ता।