-मां और बच्चे दोनों खेल के मैदान में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। परिवारों में खेल अब केवल शौक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी विरासत बनता जा रहा है।
मो सफीक खान
नोएडा। मां केवल बच्चों की परवरिश ही नहीं करती, बल्कि बच्चों की पहली प्रशिक्षक भी होती है। मदर्स डे के अवसर पर गौतमबुद्ध नगर से ऐसी ही तस्वीर सामने आई है, जहां मां और बच्चे दोनों खेल के मैदान में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। परिवारों में खेल अब केवल शौक नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी विरासत बनता जा रहा है।
सेक्टर-93 ए की वर्णिका पाल आनंद कम उम्र में ही राज्य स्तरीय जिमनास्टिक खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी थी। यही जुनून अब उनके बच्चे में भी दिखाई दे रहा है। नौ वर्षीय बेटे अहान आनंद ने लगातार तीन वर्षों से जिमनास्टिक में जिला चैंपियन रहे हैं। इसके अलावा वह राज्य स्तर पर भी पदक जीत चुके हैं और सीबीएसई राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जिले का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। कम उम्र में उनकी उपलब्धियां अन्य खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं। परिवार की सबसे छोटी सदस्य रेवाना आनंद तैराकी, जिम्नास्टिक, स्केटिंग और फुटबॉल जैसे खेल खेलती हैं।
वहीं सेक्टर-16 सी ग्रेनो की तहजीम खान किकबॉक्सिंग की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रह चुकी हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में जिले और प्रदेश का नाम रोशन किया है। वर्तमान में वह जिला किकबॉक्सिंग संघ में कोषाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं और जिले में खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने का काम भी कर रही हैं। अब उनका बेटा भी किकबॉक्सिंग की विभिन्न प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहा है।
जिले में ऐसे कई परिवार हैं, जहां मां और बच्चे दोनों अलग-अलग खेलों में सक्रिय हैं। सुबह की प्रैक्टिस, फिटनेस प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं की तैयारी के दौरान मां और बच्चों के बीच मजबूत तालमेल देखने को मिलता है। खिलाड़ियों का कहना है कि जब मां स्वयं खिलाड़ी रही हो, तो बच्चों के लिए खेल की बारीकियां समझाना आसान होता है। मैदान में मां की डांट भी होती है और हौसला भी।
कोट-
खेल से बच्चों में अनुशासन और एकाग्रता बढ़ती है। मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे भी खेलों के जरिए पहचान बनाएं। -वर्णिका पाल, जिमनास्टिक खिलाड़ी
मां खिलाड़ी हो तो बच्चों को खेल की समझ बचपन से ही मिल जाती है। मेरा प्रयास है कि नई पीढ़ी खेलों से जुड़े। -तहजीम खान, किकबॉक्सिंग खिलाड़ी