Hindi Divas: डीसीपी सेंट्रल नोएडा जोन राजेश एस कहते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने से पहले मुझे सिर्फ तमिल और अंग्रेजी आती थी, लेकिन 2013 में यूपी कैडर में आने पर लगा कि हिंदी सीखना बेहद आवश्यक है। भाषायी ज्ञान आम लोगों से जुड़ने उनकी समस्याओं को समझने के लिए बेहद जरूरी है।
हिंदी भाषियों का हिंदी प्रेम तो स्वाभाविक बात है लेकिन शहर में रह रहे तमाम गैर हिंदी भाषी लोग भी इसके आकर्षण में सहज ही बंध गए हैं। उन्हें पता नहीं चला कि कब उन्होंने हिंदी को अपनी मातृ भाषा की तरह अपना लिया और अब वह संवाद के लिए इसे माध्यम बनाने में किसी भी हिंदी भाषी की तरह ही सहज हैं।
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डीसीपी सेंट्रल नोएडा जोन राजेश एस कहते हैं कि भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होने से पहले मुझे सिर्फ तमिल और अंग्रेजी आती थी, लेकिन 2013 में यूपी कैडर में आने पर लगा कि हिंदी सीखना बेहद आवश्यक है। भाषायी ज्ञान आम लोगों से जुड़ने उनकी समस्याओं को समझने के लिए बेहद जरूरी है। एक अधिकारी के तौर पर मेरे लिए महत्वपूर्ण है कि जहां रहूं वहां के लोगों की बातों को समझ सकूं। अच्छी हिंदी बोलने में मुझे करीब दो साल लगे। अब भी मैं नए-नए शब्द सीखता रहता हूं। मेरा मानना है कि लोगों को ज्यादा से ज्यादा भारतीय भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए। मैं हिंदी वेबसाइट और किताबों आदि के माध्यम से भी लगातार ज्ञान अर्जित करने के प्रयास करता हूं। संविधान में हिंदी सहित 22 राजभाषाओं को मान्यता दी गई है। देश में भाषा आम लोगों से जुड़ने का और आसपास के वातावरण को समझने का सबसे जरूरी माध्यम है।
थ्यागराजा म्यूजिक एंड डांस अकादमी की संचालिका राजेश्वरी त्यागराजन बताती हैं कि वह मूल रूप से केरल से हैं। उन्हें बचपन में मलयालम का ही ज्ञान था, लेकिन जब उच्च शिक्षा के लिए राजस्थान गई तो थोड़ा-बहुत हिंदी बोलना सीखा। 1991 में पति के साथ नोएडा आई, यहां जब नृत्य अकादमी खोली तो अच्छी हिंदी बोलना और सीखना जरूरी था। वह कहती हैं कि मेरी ज्यादातर छात्राएं हिंदी भाषी हैं। उन्हें सिखाते या उनके लिए वीडियो बनाते वक्त मैं हिंदी का ही उपयोग करती हूं। अपनी कला को बच्चों तक आसानी से पहुंचाने के लिए जरूरी है कि मैं उनकी भाषा को समझूं। यह कला ही मेरी पहचान और जीवन का उद्देश्य है। मैं सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ी हूं। अक्सर नोएडा के गांवों में जाकर लोगों की समस्याएं सुनती हूं और उनके निवारण के लिए हर संभव प्रयास करती हूं। इस क्रम में भी जरूरी है कि मैं लोगों की भाषा समझूं ताकि वह अपना दर्द मुझसे साझा करने में सहज महसूस कर सकें।
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सलाम नमस्ते सामुदायिक रेडियो की हेड बर्षा छबारिया कहती हैं कि वह मूल रूप से बंगाली हैं। जब बड़ी हुई और कॅरिअर चुनाव की बात आई तो उन्हें लगा कि किसी ऐसे कार्य क्षेत्र में जाना चाहिए जहां लोगों से जुड़ने और अपनी बात रखने का जरिया मिल सके। मुझे बोलना बेहद पसंद है इसलिए रेडियो एक अच्छा माध्यम लगा। वह सामुदायिक रेडियो के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनाना चाहती थी। नोएडा जैसे हिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी रेडियो के क्षेत्र में ही संभावनाएं अधिक हैं, इसलिए हमेशा अपनी भाषायी समझ को विकसित करने का प्रयास किया। इसके लिए ज्यादा से ज्यादा पढ़ने और हिंदी संगीत सुनने पर जोर दिया। हिंदी साहित्य पढ़ना और हिंदी गाने सुनना रेडियो कंटेंट बनाने में भी खासा मददगार बना। एक रेडियो जॉकी से रेडियो चैनल का हेड बनने तक के उनके सफर में हिंदी ज्ञान बेहद काम आया। वह दिनभर अपने रेडियो स्टेशन पर हिंदी में ही बोलती रहती हैं उनकी भाषायी पकड़ को देखकर सहयोगी कई बार भूल ही जाते हैं कि उनकी पृष्ठभूमि बंगाली है।