-हाईकोर्ट ने नूंह के चाइल्ड वेलफेयर अफसर को लगाई फटकार
-लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित करने का चंडीगढ़ के एसएसपी को आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। नाबालिग के संरक्षण की बजाय उसे उसकी मर्जी के बिना उसके चाचा को सौंपने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने किशोरी की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने के बजाय ऐसे कदम उठाए जो किशोर न्याय अधिनियम के उद्देश्यों से पूरी तरह विपरीत थे। न्यायालय ने माना कि उनकी लापरवाही से 17 वर्षीय किशोरी को दोबारा खतरे में डाल दिया गया। वहीं, महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक द्वारा समय पर हलफनामा दाखिल न करने पर 25,000 का जुर्माना जमा कराने का निर्देश दिया।मामले की अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी।
मामला एक बंदी प्रतीक्षण याचिका से शुरू हुआ था जिसके बाद किशोरी को संरक्षण में भेजा गया था। बाद में संबंधित अधिकारियों ने उसे उसकी सहमति के बिना उसके चाचा को सौंप दिया। इससे परेशान होकर वह फिर घर से निकल गई। जस्टिस विनोद भारद्वाज ने सुनवाई के दौरान कहा कि हरियाणा के चाइल्ड ऑफिसरों ने उचित समझ, संवेदनशीलता और कानून के मूल उद्देश्य को नजरअंदाज किया। याचिकाकर्ता पक्ष ने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद लड़की को अपनी मां से उपेक्षा और परेशानियों का सामना करना पड़ा जिससे वह अपने नेक्स्ट फ्रेंड जसवंत सिंह के पास मदद लेने पहुंची। 24 सितंबर को हाईकोर्ट ने लड़की को आशियाना एंड स्नेहलाया फॉर गर्ल्स, चंडीगढ़ में रखने का आदेश दिया था और राज्य सरकार से पूछा था कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्थाएं हैं। आदेश के बावजूद रिपोर्ट दाखिल न करने पर कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों का तर्कहीन और गैर-जिम्मेदाराना रवैया जेजे एक्ट के उद्देश्य के खिलाफ है। कोर्ट ने दोषी अधिकारी पर उचित कार्रवाई के लिए आदेश की प्रति महिला एवं बाल विकास विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भेजने का आदेश दिया है। बालिग हो चुकी लड़की अदालत में पेश हुई और कहा कि उसे अब भी अपने रिश्तेदारों से खतरा है और वह जसवंत सिंह के साथ रहना चाहती है जिनसे वह विवाह भी करना चाहती है। कोर्ट ने उसकी इच्छा को रिकॉर्ड करते हुए चंडीगढ़ के एसएसपी को निर्देश दिया कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और संबंधित एसएचओ को आवश्यक आदेश जारी किए जाएं।