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Noida News: शहर में तीन रास्तों से घुसते हैं तस्कर, पशुओं को लादकर हो जाते हैं रफूचक्कर

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बिहार के गोपालगंज और चंपारण से आते हैं तस्कर, कई थानों के लगाते हैं चक्कर



तस्करी के लिए रूट मैप से लेकर सक्रिय गुर्गों की बनी रहती है लिस्ट, थाने और चौकियों में रहती है सेटिंग



गोरखपुर। पिपराइच क्षेत्र में दीपक गुप्ता की हत्या के बाद पशु तस्करी का पूरा जाल फिर से चर्चा में है। जांच में सामने आ रहा है कि तस्कर बेहद संगठित तरीके से काम करते हैं। बिहार से वह तीन अलग-अलग रास्तों से गोरखपुर जिले में प्रवेश कर ये पशुओं को ट्रकों और पिकअप में भरकर वापस बिहार चले जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि अगर पुलिस व प्रशासन ने समय रहते इस नेटवर्क पर लगाम कसी होती, तो आज दीपक की जान बच सकती थी।



पुलिस सूत्रों की मानें तो तस्करों का बड़ा जाल बिहार के गोपालगंज और चंपारण जिले से संचालित होता है। बिहार के गोपालगंज से शहर में दाखिल होने के लिए पशु तस्कर दो रास्तों का प्रयोग करते हैं। पहला कुचायकोट, सलेमगढ, माधोपुर बुजुर्ग, तमकुहीराज, पटहेरवा, कुशीनगर, हाटा, कुसमी बाजार, पिपराइच होते हुए शहर में दाखिल होती हैें। वहीं दूसरा रास्ता देवरिया, बैतालपुर, गौरीबाजार, चौरी चौरा की ओर से आने वाले तस्कर खोराबार एस्म के रास्ते शहर में दाखिल हो जाते हैं। वहीं देवरिया, रामपुर कारखाना, तरकुलवां, कुशीनगर तक आते हैं। यहां से फाजिलनगर, तमकुहीराज के रास्ते बिहार चले जाते हैं। ऐसे ही पश्चिमी चंपारण के पशु तस्कर बांसी, पडरौना, कप्तानगंज, पिपराइच होते हुए शहर में दाखिल हो जाते हैं।
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तस्कर रोजाना यहां से छोटी-बड़ी गाड़ियां चार से पांच जिलों से होते हुए शहर में प्रवेश करती हैं। इसके बाद पशुओं से लेकर निकल जाती हैं। शहर की सीमा पार करने के बाद ये गाड़ियां कुशीनगर, देवरिया होते हुए वापस बिहार में दाखिल हो जाती हैं। स्थानीय स्तर पर सक्रिय गुर्गे पुलिस से साठगांठ कर उन्हें सुरक्षित रास्ता दिखाते हैं।



तीन मुख्य रास्ते बने सिरदर्द



जांच में सामने आया है कि तस्करों ने गोरखपुर में तीन सुरक्षित रास्ते बना रखे हैं। पहला रास्ता कौड़ीराम से होते हुए कैंपियरगंज की ओर जाता है। दूसरा देवरिया मार्ग से होते हुए सहजनवां की तरफ जाता है। तीसरा रास्ता महराजगंज की सीमा से जुड़ता है। इन तीनों रूट पर चौकियां होने के बावजूद तस्कर हर बार आसानी से निकल जाते हैं। एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने के शर्त पर बताया कि तस्करों ने बाकायदा रूट मैप बना रखा है। किस दिन कहां चेकिंग ढीली रहती है, इसकी उन्हें जानकारी होती है। कई बार तो चौकियों पर पहले से ही उनका सेटिंग रहता है।
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पुलिस-तस्कर गठजोड़ पर सवाल



ग्रामीणों का आरोप है कि तस्करी का धंधा इतनी आसानी से बिना पुलिस की मिलीभगत के संभव ही नहीं है। अगर पुलिस और चौकी इंचार्ज सख्ती से कार्रवाई करें तो तस्करी कभी संभव ही नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई जगह पुलिस की आंखों के सामने गाड़ियां गुजर जाती हैं। पुलिस मूकदर्शक बनकर देखती रहती है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, यह तस्करी कोई नया खेल नहीं है। वर्षों से चल रहा है। हर थाने में इनके गुर्गों की लिस्ट होती है। अगर सरकार चाहे तो एक हफ्ते में पूरा नेटवर्क साफ हो सकता है।
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