दिल्ली उच्च न्यायालय ने घर से भाग कर प्रेम विवाह करने वाली युवती के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि वह बालिग है और उसके पिता ने गलत तरीके से उसे नाबालिग बताया था। अदालत ने युवती को तुंरत चिल्ड्रन होम से रिहा कर अपने पति के साथ भेजने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भम्भानी और न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की खंडपीठ ने यह आदेश युवती के पति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याची ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी को गैरकानूनी रूप से चिल्ड्रनहोम में रखा गया है जबकि दोनों ने अपनी इच्छानुसार विवाह किया है। उसने अपने ससुर के उस तर्क को गलत बताया कि युवती नाबालिग है और पुलिस ने इसी आधार पर उसे चिल्ड्रन होम में भर्ती करवा दिया।
खंडपीठ के निर्देश पर विडियों कांफ्रेंसिग से युवती की बाचतीन करवाई गई। युवती ने अदालत को बताया कि वह बालिग है और उसका जन्म जून 2002 को हुआ था। उसने पिता के इस तर्क को गलत बताया कि उसका जन्म फरवरी 2004 को हुआ है। दोनों ने अपनी इच्छानुसार 18 दिसंबर 2020 को विवाह कर लिया और वे दोनों साथ रहना चाहते है।
अदालत के समक्ष सरकारी वकील ने भी माना कि पुलि ने युवती द्वारा पेश जन्म प्रमाणपत्र की जांच की है और पाया है कि वह बालिग है। इसके पहले युवती के पिता की शिकायत पर उसे 25 दिसंबर को बरामद कर चिल्ड्रन होम भेजा गया था। इस बात के भी साक्ष्य है कि दोनो ने आर्य समाज मंदिर में विवाह किया है।
खंडपीठ ने सभी तथ्य देखने के बाद कहा कि युवती बालिग है और उसे अनिश्चित काल के लिए चिल्ड्रन होम में नहीं रखा जा सकता। ऐसे में उसकी इच्छरनुसार पति के साथ जाने का निर्देश देते है। अदालत ने पुलिस को दोनों की जान की सुरक्षा करने का भी निर्देश दिया है।