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प्रशासन की बेसुधी का शिकार बन रहा दादरी वेटलैंड

Fri, 29 Apr 2016 09:16 AM IST
आशुतोष दुबे/अमर उजाला, नोएडा

सार

  • 2011 में 300 काले हिरण थे, 2016 में 30 रह गए
  • 2009 में जनपद का सबसे बड़ा वेटलैंड बना कंकरीट का जंगल
  • काला हिरण अभयारण्य बनाने की है मांग
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- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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एक दशक पहले तक दुर्लभ प्रजातियों का खजाना माना जाने वाला दादरी वेटलैंड से जानवरों का पलायन जारी है। अब यहां गिनती के जानवर ही बचे हैं। बीते कुछ सालों में यहां कई गुना जानवरों की संख्या में कमी आई है। इसकी एक वजह अवैध कब्जा है।
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वेटलैंड का अधिकांश हिस्सा बिल्डरों के कब्जे में है। 2011 से पर्यावरण विद् वेटलैंड को हिरन अभयारण्य बनाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन उनके प्रयासों पर प्रशासन दखल देना उचित नहीं समझ रहा है। आलम यह है कि यहां पाए जाने वाले अधिकांश विलुप्त प्राय प्रजाति के जानवर समाप्ति की कगार पर पहुंच चुके हैं।

 2009 में जनपद के सबसे बड़े वेटलैंड के नाम से जाना जाने वाला दादरी का बील अकबर सरकारी कागजों से गायब होता जा रहा है। अब यहां बिल्डरों का कब्जा हो रहा है। पर्यावरण विद् की मानें तो वेटलैंड का करीब 75 प्रतिशत दलदली भाग पर बिल्डरों ने मिट्टी भरवा कर उसे कब्जे में ले लिया है।
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स पर निर्माण कार्य भी जारी है। अब आखिर यहां प्रवास करने वाले जानवर अपना रूख बस्तियों की ओर कर रहे हैं, जहां पहुंचकर वह तस्करों का शिकार बन रहे हैं। आकड़ों को देखें तो 1998-99 में वेटलैंड काले हिरण व जंगली खरगोश व अन्य दुर्लभ प्रजातियों की पनाह गाह था।

इसके अलावा बारहसिंघा व अन्य जानवर भी आसानी से देखे जाते थे, लेकिन 2011 तक काले हिरणों की संख्या महज 300 बची। 2016 तक इनकी संख्या 30 से भी कम है। यही हाल जंगली खरगोश का भी है।

2011-12 से 2013-14 तक जंगली खरगोशों की संख्या 50 से ज्यादा थी, लेकिन अब इनकी संख्या दहाई कर आकड़ा भी पार नहीं कर पा रही है। इसकी वजह प्राकृतिक परिवेश को लगातार हानि पहुंचाना है।

दलदली भाग बना कंकरीट का जंगल
वेटलैंड में जानवरों के लिए पानी तक नहीं है। भीषण गर्मी में बिना पानी के यह जानवर पलायन करने को मजबूर है। दरअसल, वेटलैंड में पानी का स्त्रोत एक नहर थी। जो काफी पहले ही सूख गई थी, लेकिन बरसात के समय इसके दलदली भाग में पानी भर जाता था। अब यह भाग भी बिल्डरों के कब्जे में है। यहां कंकरीट का जंगल तैयार किया जा रहा है। वह भी वेटलैंड के नाम पर।

प्रशासन की अनदेखी का शिकार जानवर
बता दें कि 2009 में जनपद में कुल 19 वेटलैंड थे। लेकिन इनकी संख्या घटकर महज 6 बची है। आलम यह है कि जनपद का सबसे बड़ा वेटलैंड भी धरातल से गायब होता दिख रहा है। इसके लिए पर्यावरण विदों ने 2011 में प्रशासन से इस वेटलैंड को काले हिरण अभयारण्य बनाने की मांग रखी थी।

ताकि यहां काले हिरणों को विलुप्त होने से बचाया जा सके, लेकिन पांच साल बाद भी प्रशासन का रुख वैसा ही है। ऐसे में एक बार फिर पर्यावरणविदों ने प्रशासन से मांग की है। जिससे इस वेटलैंड को बचाया जा सके।

तस्करों का बन रहे शिकार
समाजसेवी डॉ. आनंद आर्या ने बताया कि सूखे कंकरीट के चलते वेटलैंड में दलदली घास पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। रात में भोजन की तलाश में हिरण, सियार झुंड में आसपास के गांवों की ओर बढ़ते हैं। ऐसे में वह तस्करों का शिकार बन रहे हैं। जिनको रोकने का प्रयास भी नहीं किया जा रहा।
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