ढाबा की जगह फूड कोर्ट
बनाने के फैसले का विरोध
- छात्रों ने कहा- गंगा ढाबा बंद होने से बदल जाएगी जेएनयू की पहचान
- छात्रसंघ और शिक्षक यूनियन ने सोशल मीडिया पर जताई आपत्ति
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस की पहचान गंगा ढाबा से होती है। ढाबा बंद होने से जेएनयू की पहचान ही बदल जाएगी। जेएनयू के लिए यह सिर्फ ढाबा नहीं है, बल्कि देश-दुनिया पर चर्चा का ठिकाना होने के साथ ही पहचान भी है। सोशल मीडिया पर छात्रों ने पूर्व छात्रों से भी ढाबा बचाने की अपील की है। फूड कोर्ट नहीं, ढाबा से जेएनयू की पहचान के लिए सबसे वोट भी मांगे जा रहे हैं।
जेएनयू की कार्यकारी परिषद ने ढाबे की बजाय फूड कोर्ट बनाने का फैसला लिया है। इसी के चलते छात्रसंघ विरोध में आ गया है। छात्रसंघ ने कुलपति प्रो. एम जगदीश कुमार पर विश्वविद्यालय की पहचान खत्म करने का आरोप लगाया है। ढाबे पर खाना सस्ता होने के साथ लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। ढाबा जेएनयू की पहचान है। देश और दुनिया के किसी भी मुद्दे पर चर्चा और सुझाव ढाबे पर ही होते हैं। ढाबे पर बैठकर छात्रसंघ के चुनावी मुद्दों और मतदाताओं से सीधी बात होती है। ढाबा कल्चर के चलते दिल्ली के हर कोने से युवा इन्हीं ढाबा में खाना खाने आते हैं।
जेएनयू फेसबुक पेज पर छात्रों और शिक्षक यूनियन ने आपत्ति जताई है। साथ ही पूर्व छात्रों से जेएनयू ढाबा बचाने की अपील की है। सोशल मीडिया पर भी जेएनयू ढाबा बचाओ अभियान शुरू हो गया है। छात्रों का कहना है कि जेएनयू में आम व पिछड़े इलाकों के छात्र पढ़ने आते हैं। आर्थिक दिक्कत के चलते ही वे स्कॉलरशिप राशि से उच्च शिक्षा का सपना पूरा कर पाते हैं। क्योंकि यहां दाखिला फीस सबसे कम है। इस वर्ग के छात्रों को फूड कोर्ट की बजाय ढाबा ही पसंद आता है। ढाबा बंद होने से जेएनयू की पहचान गुम हो जाएगी।