रेल बजट में इस बार भी नोएडा वासियों की ‘उम्मीदों की ट्रेन’ पटरी पर नहीं चढ़ पाई। नोएडा एनसीआर का एक मात्र ऐसा शहर है, जहां पर 40 साल बाद भी ट्रेन नहीं पहुंच पाई है।
लाखों की आबादी वाले इस शहर से बाहर जाने के लिए लोगों को आज भी दूसरे राज्य और दूसरे जिले के भरोसे यात्रा करनी पड़ती है। न तो केंद्र सरकार ने कोई योजना बनाई और न ही राज्य सरकार ने इस संबंध में कोई प्रयास किया। यहां तक स्थानीय जन प्रतिनिधियों ने भी इस बाबत आवाज बुलंद नहीं की।
मंगलवार को पेश हुए केंद्रीय रेल बजट में एक बार फिर निराशा हाथ लगी। नोएडा को औद्योगिक नगरी के रूप में बसाया गया था। यहां पर सात हजार से ज्यादा औद्योगिक इकाइयां हैं, जबकि छोटी बड़ी सैकड़ों कंपनियां काम कर रही हैं।
यहां रेल की दरकार सालों से है, लेकिन हर साल के रेल बजट में नोएडा का हाथ खाली रह जाता है। एनसीआर के शहरों गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव तक रेल सेवा है, लेकिन नोएडा में रेल आज तक नहीं पहुंच सकी। नोएडा की आबादी दस लाख से ज्यादा हो चुकी है।
यहां पर रहने वाले लोग मूल रूप से दूसरे राज्यों और दूसरे जिलों के निवासी हैं। नोएडा से ट्रेन न होने के कारण लोगों को शहर से जाने के लिए पसीना बहाना पड़ता है। शहर को ट्रेन की आवश्यकता का पता इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पर प्रतिदिन 3000 से ज्यादा रेल टिकटों का आरक्षण होता है, जबकि ऑनलाइन टिकट करवाने का आंकड़ा इससे सात गुने से भी ज्यादा है।
औद्योगिक नगरी होने की वजह से शहर से बाहर भेजे जाने वाला कच्चा और तैयार माल भी दूसरे जगहों के भरोसे रहता है। इंडस्ट्री की ओर से कई बार इस समस्या को स्थानीय प्रतिनिधियों से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के मंत्रालय तक पहुंचाया गया, लेकिन परिणाम शून्य ही मिला।
नोएडा से औद्योगिक उत्पाद सड़क मार्ग द्वारा दिल्ली पहुंचता है। इसके बाद और कहीं ले जाया जाता है। हालांकि दिल्ली-मुंबई-इंडस्ट्रियल-कॉरिडोर के लिए प्रदेश और केंद्र सरकार प्रयास कर रही है। इसकी शुरुआत ग्रेटर नोएडा के बोड़ाकी से होनी है। यह लाइन नोएडा से होकर जाएगी। यह सपना कब पूरा होगा, फिलहाल इसका समय तय नहीं है।