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Delhi NCR News: सह-अभियुक्तों को एक साथ पैरोल या फरलो नहीं देने का कोई सख्त प्रतिबंध नहीं

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अमर उजाला ब्यूरो
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नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सह-अभियुक्तों को एक साथ पैरोल या फरलो देने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने कहा कि दिल्ली जेल नियमावली, 2018 के नियमों की कठोर या यांत्रिक व्याख्या न्याय के उद्देश्य को विफल कर देगी। बुधवार को दिए गए फैसले में न्यायालय ने दो दोषसिद्ध कैदियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। दोनों कैदियों को केवल इसलिए फरलो देने से इनकार कर दिया गया था क्योंकि उनके सह-अभियुक्त को पहले ही यह राहत मिल चुकी थी। न्यायालय ने कहा कि पैरोल और फरलो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़े हैं। ये प्रावधान कैदियों को परिवार और सामाजिक संबंध बनाए रखने, मानसिक स्वास्थ्य सुधारने और समाज में पुनर्वास करने में मदद करते हैं। यदि सह-अभियुक्त के पहले रिहा होने के आधार पर दूसरे को भी राहत से वंचित रखा जाए, तो खासकर कई अभियुक्तों वाले मामलों में कैदी वर्षों तक किसी भी राहत से वंचित रह सकते हैं, जो सुधारात्मक न्याय की भावना के विरुद्ध है।
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एक साथ रिहाई वांछनीय नहीं लेकिन प्रतिबंधित भी नहीं
अदालत ने दिल्ली जेल नियमावली के नियम 1212 के नोट-2 और नियम 1224 के नोट-1 की व्याख्या करते हुए कहा कि इनमें प्रयुक्त शब्द “ऑर्डिनरली नॉट पर्मिसेबल” का अर्थ है कि सह-अभियुक्तों की एक साथ रिहाई सामान्यतः वांछनीय नहीं है, लेकिन यह पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। ऑर्डिनरली शब्द स्वयं प्राधिकारी को विवेकाधीन शक्ति देता है।
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