रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में भूजल के रिचार्ज के लिए 1486.6 वर्ग किमी क्षेत्र उपलब्ध है। इसमें से 709.81 वर्ग किमी में क्षमता से ज्यादा भूजल का दोहन हो रहा है। वहीं, 179.37 वर्ग किमी बेहद नाजुक और 201.57 वर्ग किमी क्षेत्र नाजुक श्रेणी में हैं। सिर्फ 201.57 वर्ग किमी क्षेत्र इस लिहाज से सुरक्षित है। जमीन के अंदर जितना पानी निकाला जा रहा है, उसमें करीब 45.23 फीसदी अति दोहन श्रेणी में है।
रिपोर्ट भूजल दोहन में बढ़ोतरी की वजह भी बताती है। दिल्ली जल बोर्ड ने राजधानी में करीब 12,000 निजी ट्यूबवेल को रजिस्टर्ड कर रखा है। यह ज्यादातर उसी इलाके में हैं, जहां भूजल का ज्यादा दोहन हो रहा है। वहीं, बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी भी होती है।
आंकड़ा
-मूल्यांकन इकाई तहसील, 34 तहसीलों में से 15 में हो रहा भूजल अति-दोहन। सात में बेहद नाजुक और आठ नाजुक। सिर्फ चार तहसील में सुरक्षित।
-दिल्ली में सालाना 0.41 अरब घन मीटर पानी जाता जमीन के अंदर, जबकि 0.36 अरब घन मीटर की होती निकासी। मतलब 98.16 फीसदी जमीन के अंदर जाने वाले पानी की हो जाती निकासी।
-दिल्ली का 89 फीसदी हिस्सा कछारी है। बाकी 11 फीसदी पहाड़ी है। इसलिए ज्यादातर भूजल की निकासी ट्यूबवेल से होती है।
-नए कछारी क्षेत्र में 4-10 लीटर प्रति सेकेंड और पुराने कछारी क्षेत्र में 25-55 लीटर प्रति सेकेंड की दर से पानी की निकासी होती है। जबकि पहाड़ी क्षेत्र में यह दर होती .6 से 5 लीटर प्रति सेकेंड तक होती है।
राहत के भी मिले संकेत
रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 की तुलना में 2022 में ज्यादा भूजल रिर्चाज हुआ। यह आंकड़ा 0.32 अरब घन मीटर से बढ़कर 0.41 अरब घन मीटर हो गया। वहीं, इस बीच भूजल निकासी में भी इजाफा हुआ है। दोनों साल में यह 0.29 अरब घन मीटर से बढ़कर 0.37 अरब घन मीटर हो गया है। बढ़ोत्तरी की तुलना में निकासी थोड़ी कम है। तभी भूजल दोहन 101.4 फीसदी से घटकर 98.16 फीसदी दर्ज किया गया। इसकी वजह जल संरक्षण की दिशा में उठाए गए कदमों को बताया गया है।