रंगदारी, माफिया और अपराधों के ऊंचे ग्राफ को लेकर भले ही गौतमबुद्ध नगर सुर्खियों में रहा हो, लेकिन यहां के चुनावों पर अब तक कोई दाग नहीं लगा है। लोकतंत्र का उत्सव यहां हमेशा ही शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ है।
जिले में माफिया के खूनी टकराव की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन किसी चुनाव में अपराधी पार्टी या प्रत्याशी से सीधे तौर पर नहीं जुड़े। यही वजह है कि पुलिस व प्रशासन को चुनाव शांति से निपटाने के लिए क्रिटिकल बूथों के चयन में मशक्कत नहीं करनी पड़ी। इस बार भी हालात सामान्य ही नजर आ रहे हैं।
इस सीट के रिकॉर्ड हैं अनोखे
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक चार विधानसभा व दो लोकसभा चुनाव में कभी भी बूथ लूटने या वोटिंग के लिए हिंसा नहीं हुई। आपसी कहासुनी के कुछ मामले हुए, लेकिन वह थानों तक नहीं पहुंचे।
आंकड़े बताते हैं कि कभी भी किसी बूथ पर पुनर्मतदान नहीं कराना पड़ा। 2005 और 1995 में चुनावों के दौरान मारपीट व बूथ कब्जा करने के प्रयास की घटनाएं सामने आई थीं, लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई। पिछले वर्ष निर्वाचन आयोग ने अतिसंवेदनशील बूथ की भी एक श्रेणी बनाई थी। जिसे क्रिटिकल बूथ का नाम दिया गया था।
ऐसे होता है क्रिटिकल बूथ का चुनाव
क्रिटिकल बूथों का चयन पांच बिंदुओं पर किया गया था। जिसमें चुनावी हिंसा वाला पोलिंग बूथ, पुनर्मतदान वाला बूथ भी रखे गए थे। लेकिन, प्रशासन व थानों से मिले आंकड़ों में इस सीट पर पुनर्मतदान और हिंसा की बातें नहीं सामने आईं।
पुलिस अधिकारी मानते हैं कि चुनाव के दौरान निरोधात्मक कार्रवाई के चलते बदमाश या तो जेल में होते हैं या फिर जिले से बाहर। जिसके चलते चुनावों में गड़बड़ी की संभावना काफी कम हो जाती है।
एसएसपी डॉ. प्रीतिंदर सिंह नेबताया कि जिले में 2009 का लोकसभा चुनाव व 2012 का विधानसभा चुनाव हिंसा मुक्त रहा है। इससे पहले छोटे-मोटे झगड़े पूर्व के चुनावों में हुए, लेकिन जानमाल का नुकसान नहीं हुआ।