उस घिनौनी वारदात को हुए दो साल बीत गए। आज एक बेटी की नजर से देखें या बाप की नजर से, दिल्ली वहीं खड़ी दिखती है और बिटिया वहीं पड़ी दिखती है। जनता का वो आक्रोश भी उन मुट्ठी भर लोगों का जमीर नहीं जगा पाया जो कभी शिव कुमार यादव तो कभी किसी और रूप में सामने आ जाते हैं। निर्भया की शहादत भी बेटियों को निर्भय नहीं बना पाई।
उस रात दिल्ली के पालम निवासी राजकुमार हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) में पेट्रोलिंग ऑफिसर (अनुबंध पर) था। 16 दिसंबर को उसकी ड्यूटी साथी अजीत सिंह और सुरेंद्र सिंह के साथ एनएच-8 पर थी। वह बाइक पर पेट्रोलिंग करते हुए मौके पर पहुंचा।
उसने बचाओ-बचाओ की आवाज सुनी। आवाज सुनकर वह अंधेरे में एक झाड़ी के पास पहुंचा। वहां एक लड़का और लड़की थे। दोनों के शरीर पर कपड़े नहीं थे। उसने युवती को अपनी स्वेटर दिया और लड़के को शर्ट दी। इसके बाद वह विपरीत दिशा में स्थित होटल-37 में गया।
वहां से एक चादर और पानी की बोतल लेकर आया। उसने चादर के दो टुकड़े किए। चादर लुंगी की तरह दोनों को बांधी। पानी की बोतल से पानी निकाल कर लड़की के होठों पर लगाया और लड़के को पानी पिलाया। इसके बाद एनएचएआई के कंट्रोल रूम में फोन किया था, जहां से सूचना पुलिस तक पहुंची। राजकुमार कहते हैं कि आज भी जब उस रास्ते से गुजरता हूं तो शरीर में सिहरन दौड़ जाती है।
टोल प्लाजा के बंद होने से राजकुमार इस समय बेरोजगार है। उसे तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी बुलाया था। सभी ने उसे नौकरी का आश्वासन दिया, मगर आर्मी मैन रह चुके राजकुमार को अभी तक नौकरी नहीं मिली है।
(फोटो: निर्भया केस से प्रेरित एक मॉडलिंग फोटो शूट)
वो मुझसे पूछती है मैं क्या कर रहा हूं
‘वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी निर्भय हैं। लोग यह भी कहते हैं कि वो फैसले लेते हैं। क्या वो न्याय दिलाने में हमारी मदद करेंगे।’ यह छोटा सा सवाल बिटिया के पिता ने सोमवार को पूछा। वह कहते हैं, ‘उस दिन से आज तक कुछ नहीं बदला है। नेताओं और मंत्रियों ने जो वायदे किए थे सब खोखले निकले। मेरी बेटी मुझसे पूछती है कि मैंने उसे न्याय दिलाने के लिए क्या किया।’
बिटिया की यादों को सीने में समेटे हुए वह आगे कहते हैं, ‘वो मुझसे पूछती है कि उसके जैसी और बेटियों को इंसाफ दिलाने के लिए मैं क्या कर रहा हूं और मैं जब जागता हूं तो खुद को कितना बेबस पाता हूं।’ उनका परिवार सुप्रीम कोर्ट से आने वाले फैसले का इंतजार कर रहा है। चेहरे पर निराशा और गुस्से का भाव लिए बिटिया के पिता ने कहा, ‘उन बलात्कारियों और कातिलों को फांसी के फंदे पर टांगने से कौन रोक रहा है, जबकि सारे सबूत मौजूद हैं।’
वो दर्द भुलाए नहीं भूलता
16 दिसंबर की घटना की पीड़िता के इलाज में 12 दिनों तक इलाज में लगे चिकित्सकों का कहना है कि वह एक दर्दनाक हादसा था जिसे भुलाया नहीं जा सकता। इलाज करने वाले चिकित्सकों का कहना है कि इतनी तकलीफ में उन्होंने किसी मरीज को इतने दिनों तक कभी नहीं देखा।
चिकित्सकों का कहना है कि 12 दिनों तक पीड़िता का इलाज चला तो उसमें चिकित्सकों के साथ-साथ लड़की की बहादुरी भी एक बड़ी वजह थी। उसने इलाज में चिकित्सकों को काफी मदद की थी। सिंगापुर के अस्पताल में रेफर करने से पहले उसकी पांच सर्जरी सफदरजंग में की गई थी लेकिन संक्रमण को काबू नहीं किया जा सका।
रेपिस्ट की मां ने दो साल बाद खोला मुंह
दिल्ली के वसंत विहार गैंगरेप के बहुचर्चित मामले का नाबालिग आरोपी इस्लामनगर थाना क्षेत्र के एक गांव का रहने वाला है। आरोपी इस समय नई दिल्ली के बाल सुधार गृह में हैं। मामले की सुनवाई से लेकर बाल सुधार गृह भेजे जाने और उसके बाद इस नाबालिग से परिवार को काई भी व्यक्ति मिलने तक नहीं गया है।
बेटे से अब तक मिलने न जाने के सवाल पर आरोपी की मां बोलीं, हमें तो कभी उससे एक पैसे का आसरा नहीं रहा। वह आठ साल की उम्र में गांव से चला गया था। उसके बाद एक बार उसने तीन हजार रुपये भेजे थे। उसके बाद वह न तो कभी गांव आया और न ही कभी घरवालों का हालचाल लिया।
मां ने कहा, बच्चे पालने मुश्किल हो रहे हैं, उससे मिलने कैसे जाएं। बता दें कि नाबालिग आरोपी के पिता मंदबुद्धि हैं। परिवार में मां-बाप के अलावा दो बहनें, तीन भाई और हैं। सभी लोग मजदूरी कर गुजारा करते हैं।
यह पूछने पर कि बाल सुधार गृह से रिहा होकर अगर वह गांव लौटा तो क्या परिवार के लोग उसे अपना लेंगे? मां ने कहा, उन्हें नहीं लगता कि अब वह गांव लौटेगा लेकिन अगर आया तो जरूर अपनाएंगे। आखिर वह उनका बड़ा बेटा है। दिल्ली जाकर गलत लोगों की सोहबत से बिगड़ गया। वह शुरू से ऐसा नहीं था।
अपना गांव छोड़ने के बाद इस नाबालिग ने चाय की दुकान पर काम किया था। बाद में प्राइवेट बस में क्लीनर के तौर पर काम करने लगा था।
तो क्या आज भी दिल्ली में होंगे छह रेप?
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो अब भी राजधानी में रोजाना औसतन छह महिलाएं रेप का शिकार होती हैं। इसके अलावा 12 महिलाओं के साथ किसी न किसी तरह की छेड़छाड़ होती है। यह तो वह आंकड़े हैं, जिन मामलों में पीड़ित शिकायत करने थाने जाती हैं। पुलिस अधिकारी रेप और छेड़छाड़ के बढ़ते आंकड़ों के पीछे कुछ और ही तर्क देते हैं।
उनका कहना है कि उस कांड के बाद बने सख्त कानून ने महिलाओं के विश्वास को बढ़ाया है। ऐसे में वह महिलाएं अब थाने में शिकायत करने की हिम्मत कर लेती हैं, जो पहले लोकलाज के डर से थाने तक नहीं पहुंच पाती थीं। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि वारदात दर्ज होने के बाद पुलिस ने 90 फीसदी से ज्यादा मामलों को सुलझा लिया है।
दुष्कर्म के कुछ आंकड़े :
वर्ष-------दुष्कर्म के मामले
2014-------1968
2013-------1559
2012-------706
2011-------572
(नोट: 2014 में दुष्कर्म के आंकड़े 30 नवंबर तक के हैं )
समय के साथ किए वादे को भूल गई सरकार
दिल्ली के वसंत विहार में जिले की बिटिया के साथ 16 दिसंबर की ही तारीख को दो साल पहले 2012 में दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी थी। उस घटना को याद करके बिटिया के गांव का हर कोई आज भी सिहर उठता है। दरिंदगी की शिकार बिटिया के बाबा के चेहरे पर गुस्सा और आंखों में आंसू है।
उनका कहना है कि बिटिया की याद, उसकी शहादत की याद के बहाने क्षेत्र के विकास की उम्मीदें बंधी थीं। बिटिया की तेरहवीं में जब मुख्यमंत्री श्रद्धांजलि देने आए थे तो भी ऐसा ही लग रहा था। पर अब समय के साथ सारी उम्मीदें खत्म होती जा रही हैं। वादे के मुताबिक क्षेत्र में न प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बना और ना ही कोई ट्रेन चली। घर तक सड़क तो बनी लेकिन ऐसी घटिया कि टूटने लगी है।
बिटिया के बाबा ने कहा कि सरकार ने विकास के नाम पर जख्म देने का काम किया है। गांव में उसके नाम पर विकास के सभी काम अधूरे पड़े हैं। बिटिया की तेरहवीं पर 11 जनवरी, 2013 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आए थे और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने की घोषणा की थी। परिवार के लोगों से मिलकर उनके आंसू पोंछे थे। गांव को विकास से जोड़ने की बात कही।
तब देश आंदोलित था तो नेता विकास की गंगा बहाने की बात कह रहे थे लेकिन आज सब भूल चुके हैं। बिटिया के बाबा कहते हैं कि शासन-प्रशासन की लापरवाही से अस्पताल मूर्त रूप नहीं ले सका है। यदि शासन-प्रशासन में बैठे लोग विवादित जमीन की जगह साफ-सुथरी जमीन का चयन करते तो आज बिटिया के नाम पर अधूरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बन चुका होता।
दो साल बाद भी सभी निजी बसों में नहीं लगे जीपीएस
16 दिसंबर की घटना के बाद परिवहन विभाग ने बसों समेत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के वाहनों में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) लगाने का आदेश जारी किया था। मंगलवार को इस घटना को दो साल हो जाएंगे। मगर आज भी करीब तीन हजार निजी ऑपरेटरों की बसों में जीपीएस नहीं लगा है।
मालूम हो कि हादसे के बाद परिवहन विभाग ने वाहनों के मूवमेंट पर नजर बनाए रखने के लिए बस, ऑटो, रेडियो टैक्सी, स्कूल कैब, ग्रामीण सेवा समेत कुछ पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाहनों में जीपीएस लगाना अनिवार्य कर दिया था। यही नहीं अब फटफट सेवा जैसे वाहनों के रिप्लेसमेंट पॉलिसी में इसे अनिवार्य कर दिया है। मगर यह अनिवार्यता अभी तक सिर्फ कागजों पर ही नजर आ रही है।
बार-बार नोटिस के बाद हजारों बसों में जीपीएस सिस्टम नहीं लगाया गया है। यही नहीं बहुत सी ऐसी बसें भी दिल्ली में दौड़ रही हैं जिनका सही पता परिवहन विभाग के पास नहीं था। जिसके चलते बीते अक्तूबर में 2579 बसों का परमिट तक कैंसल किया गया। हाल ही में तीन हजार से ज्यादा ऑटो परमिट धारकों को भी सही पता देने के लिए नोटिस दिया गया है।
तीन अस्पतालों में खुले वन स्टॉप सेंटर
दिल्ली के वसंत विहार हादसे के बाद दुष्कर्म पीड़िताओं को इलाज मिलने, बयान लेने और काउंसलिंग देने में किसी तरह की दिक्कत न हो इसलिए दिल्ली सरकार ने तीन अस्पतालों के आपातकालीन विभाग में वन स्टॉप सेंटर की शुरुआत की। आपातकालीन विभाग के पास बने एक कमरे में इलाज की सुविधा, चिकित्सीय उपकरण, पीड़िता का बयान, काउंसलिंग व अन्य सुविधाएं दी जाती हैं।
सरकार की ओर से यह भी निर्देश दिया गया कि ऐसी घटना के बाद पीड़िता को सबसे निकट के अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया जाए चाहे वह सरकारी हो या निजी लेकिन आज भी इस निर्देश का पालन नहीं हो रहा है। पुलिस ऐसी वारदात के बाद पीड़िता को सरकारी अस्पताल ही ले जाती है। हालांकि अन्य अस्पतालों में अभी भी काफी सुधार किया जाना बाकी है।
50 थानों से बजी महिलाओं के लिए वो घंटी
दिल्ली में महिलाओं के लिए कौन से इलाके सबसे अधिक खतरनाक हैं, इस बाबत घंटी दिल्ली सचिवालय में बजती है। दरअसल महिला हेल्पलाइन नंबर 181 पर जब महिलाएं शिकायत करती हैं तो उनकी शिकायत ऑनलाइन रजिस्टर की जाती है। जब किसी एक ही थानाक्षेत्र में चौबीस घंटे या 48 घंटे में 7 से अधिक छेड़छाड़, पीछा करना, छींटाकशी करना, बलात्कार वगैरा की शिकायत आतीं है तो सॉफ्टवेयर में एक अलार्म बजता है।
इससे पता लगता है कि महिलाओं के लिए इस थानाक्षेत्र में सबसे अधिक दिक्कत है। राजधानी के पचास थाने ऐसे हैं, जहां से महिलाओं के लिए खतरे की घंटी 100 से ज्यादा बजी है। 181 पर दैनिक 2000 कॉल आती हैं। हेल्पलाइन की संयोजिका खदीजा फारुकी बताती हैं कि यौन उत्पीड़न से जुड़ी 25594 शिकायतें अभी तक मिली हैं। इसमें से 80 फीसदी मामले कोर्ट तक पहुंचे जिसमें से 30 फीसदी में फैसला भी आ चुका है।
इन थानों में बजी घंटी
उत्तम नगर, सुल्तानपुरी, नांगलोई, नरेला, जहांगीरपुरी, अमन विहार, मंगोलपुरी, डाबड़ी, नजफगढ़, बुराड़ी, तिलक नगर, गोकलपुरी।
बिटिया का इंसाफ अधूरा है
दिल्ली के वसंत विहार गैंगरेप मामले को हुए दो वर्ष बीत गए, लेकिन बिटिया को पूरा न्याय कब मिलेगा यह तय नहीं। ट्रायल व हाईकोर्ट ने जिस तेजी से मामले का निपटारा किया उससे लगने लगा था कि संभवत: इसी वर्ष फैसला हो जाएगा, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में जाकर सुनवाई पर ब्रेक लग गया। सर्वोच्च न्यायालय अभी तक सुनवाई की तिथि तय नहीं की। यानी सुनवाई एक माह में भी शुरू हो सकती है या फिर कई वर्ष तक इंतजार करना पड़ सकता है।
इस मामले की सुनवाई साकेत कोर्ट में प्रतिदिन चली। दोषियों व उनके वकीलों के रवैये, 80 से ज्यादा गवाहों इत्यादि के कारण निचली अदालत में फैसले को नौ माह लग गए। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने 13 सितंबर 2013 को विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, मुकेश व पवन को फांसी की सजा सुना फाइल हाईकोर्ट में भेज दी थी। पांचवें आरोपी राम सिंह ने 11 मार्च 13 को तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी।
दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टि की फाइल हाईकोर्ट में पहुंची। हाईकोर्ट ने तुरंत संज्ञान लेकर 23 सितंबर को ही दोषियों से जवाब तलब कर लिया। हाईकोर्ट ने दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई कर मात्र छह माह में ही अपील का निपटारा कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल रखा। हाईकोर्ट ने अपना फैसला 13 मार्च को दिया।
दोषी मुकेश व पवन ने तुरंत सर्वोच्च न्यायालय में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे दी। वहीं दोषी विनय व अक्षय ठाकुर ने जुलाई माह में अपील दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील को स्वीकार करते हुए फांसी की सजा पर रोक लगा दी।
इस मामले से जुड़े रहे विशेष सरकारी वकील दयान कृष्णन ने माना कि ट्रायल कोर्ट व हाईकोर्ट में हर संभव तरीके से प्रयास कर मामले का जल्द निपटारा किया गया, लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय में यदि सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो सुनवाई लंबे समय तक भी लटक सकती है। उनका कहना है कि सरकारी वकील को जल्द सुनवाई के लिए आवेदन दाखिल करना चाहिए, क्योंकि सुनवाई के लिए कोई तय सीमा नहीं होती।
कुल मिलाकर पूर्ण न्याय मिलने में काफी लंबा समय लग सकता है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय से निपटारे के बाद भी दोषियों के पास राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करने का अधिकार है।
उस काली भयानक रात से अब तक
-16 दिसंबर 2012: वसंत विहार में 23 साल की पैरा मेडिकल की छात्रा व उसके मित्र को बस में सवार कर नाबालिग समेत 6 लोगों ने युवती से चलती बस में गैंगरेप किया। दोनों को बस से कुचलकर मारने का प्रयास।
-17 दिसंबर 2012: पुलिस ने मुख्य आरोपी एवं बस चालक राम सिंह सहित चार लोगों को पकड़ा।
-18 दिसंबर 2012: चार आरोपियों के पकड़ने के साथ ही राजधानी में गैंगरेप के विरोध में प्रदर्शन शुरू।
-21 दिसंबर 2012: गैंगरेप के पांचवें आरोपी ने कहा कि वह नाबालिग है। उसकी उम्र साढ़े सत्रह वर्ष है।
-22 दिसंबर 2012: पीड़िता ने एसडीएम के सामने अस्पताल में अपने बयान दर्ज कराए।
-23 दिसंबर 2012: दिल्ली हाईकोर्ट ने तेजी से सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया।
-24 दिसंबर 2012: पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी, तेजी से सुनवाई और कानून बनाने के लिए एक कमेटी का गठन किया।
-27 दिसंबर 2012: गैंगरेप पीड़िता की हालत बिगड़ने पर उसे इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया।
-29 दिसंबर 2012: पीड़िता की सिंगापुर के अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।
-3 जनवरी 2013: दिल्ली पुलिस ने पांच आरोपियों के खिलाफ हत्या, गैंगरेप, अप्राकृतिक यौनाचार, सबूत मिटाने का आरोप पत्र दाखिल किया।
-28 जनवरी 2013: आरोपियों में से एक को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने नाबालिग घोषित किया।
-2 फरवरी 2013: फास्ट ट्रैक कोर्ट ने पांच लोगों पर हत्या, गैंगरेप और मामलों में आरोप तय किए।
-11 मार्च 2013: गैंगरेप आरोपियों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर जान दी।
-11 जुलाई 2013: जेजेबी ने नाबालिग को लूटपाट मामले में दोषी ठहराया।
-25 अगस्त 2013: नाबालिग पर फैसले की तारीख बढ़ाई।
-31 अगस्त 2013: नाबालिग को गैंगरेप व हत्या में तीन वर्ष की सजा सुनाई गई।
-03 सितंबर: चार वयस्क आरोपियों के खिलाफ विचाराधीन मामले की सुनवाई पूरी।
-10 सितंबर: गैंगरेप व हत्या के आरोपी विनय, अक्षय, पवन व मुकेश को दोषी करार दिया गया।
-11 सितंबर: चारों दोषियाें को हत्या व गैंगरेप सहित 10 धाराओं में दोषी ठहराया। सजा के लिए 13 सितंबर की तिथि दी गई।
-13 सितंबर 2013 को विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, मुकेश व पवन को साकेत कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई।
13 मार्च 2014 को हाईकोर्ट ने दोषियों की अपील को नामंजूर कर चारों की फांसी की सजा को बरकरार रखा।
मार्च 2014 में मुकेश व पवन ने तथा माह जुलाई 2014 में विनय व अक्षय ने हाईकोर्ट की सजा के खिलाफ अपील की, इस पर अभी सुनवाई शुरू होनी है।
15 दिसंबर 2014 वसंत विहार गैंग रेप की दूसरी बरसी पर लोगों ने सड़कों पर उतरकर फिर आक्रोश जताया।