अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि भारत में गैस्ट्रोस्कीसिस के साथ जन्म लेने वाले बच्चों के बचने की दर 45 प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी देशों में आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और एक ही जगह मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की मौजूदगी के कारण यह 90 प्रतिशत है।
गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल द्वारा गैस्ट्रोस्कीसिस से पीड़ित एक नवजात बच्ची का सफलतापूर्वक इलाज किया गया है। बच्ची की आंतें गर्भनाल के पास पेट की दीवार में एक छेद से होकर शरीर से बाहर निकली हुई थी। बच्चों की माता साक्षी शुक्ला ने बताया कि गर्भावस्था के 18 से 20 हफ्तों के दौरान किए जाने वाले लेवल 2 के स्कैन में बच्ची के इस जन्मजात विकार के बारे में जानकारी मिली थी। इसके बाद प्रसव के दौरान उन्हें अस्पताल लाया गया। यहां डॉक्टरों की टीम द्वारा उनका और बच्ची का इलाज किया गया। इलाज के बाद वह और उनकी बच्ची पूरी तरह से स्वस्थ है।
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देश में 45 प्रतिशत है इस बीमारी से बचने की दर
अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि भारत में गैस्ट्रोस्कीसिस के साथ जन्म लेने वाले बच्चों के बचने की दर 45 प्रतिशत है, जबकि पश्चिमी देशों में आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और एक ही जगह मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की मौजूदगी के कारण यह 90 प्रतिशत है। टर्शियरी और क्वाटर्नरी केयर सेंटर बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, हाई-रिस्क प्रेगनेंसी में विशेषज्ञ टीमों, लेवल-3 एनआईसीयू सुविधा से लैस अस्पताल ही इसका बेहतर इलाज कर पाते हैं।
क्या होता है गैस्ट्रोस्कीसिस
गैस्ट्रोस्किसिस एक जन्मजात दोष है, जिसमें नाभि के पास पेट की दीवार में एक छेद होता है। इसके परिणामस्वरूप बच्चे की आंतें बच्चे के शरीर से बाहर निकल जाती हैं। कभी-कभी पेट और लीवर जैसे अन्य अंग बच्चे के शरीर के बाहर पाए जा सकते हैं। डॉक्टरों ने बताया कि गैस्ट्रोस्कीसिस के मामले में यह बहुत आवश्यक होता है कि शिशु पूरे समय के बाद जन्म ले क्योंकि समय पूर्व जन्म लेने पर पहले से मुश्किल परिस्थिति और ज्यादा जोखिमों एवं जटिलताओं के साथ और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन जाती है।
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पॉलीथिन की थैली में लपेटकर रखी गई थी आंतें
अस्पताल के नियोनैटोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. टीजे एंटोनी ने बताया कि शिशु अच्छी तरह से और सामान्य रूप से साँस ले सके, इसके लिए जन्म के समय नियोनैटल टीम मौजूद रही। सर्जिकल टीम ने एक साथ काम करके सुनिश्चित किया कि उसकी आँतें सूख न पाएं, और उन्हें नम बनाए रखने के लिए पॉलिथीन में लपेटे रखा और कीटाणुओं एवं प्रदूषकों से उनकी सुरक्षा की। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि कोई भी ब्लॉकेज या गलत घुमाव न हो सके। फिर हमने शिशु को नियोनैटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में पहुँचा दिया, जहाँ उसकी हालत स्थिर की गई, उसका प्रारंभिक इलाज किया गाय और दो घंटे के बाद उसे सर्जरी के लिए तैयार कर लिया गया।’
डेढ़ घंटे में की गई सर्जरी
पीडियाट्रिक सर्जरी के डायरेक्टर शंदीप कुमार सिन्हा ने बताया कि पूरी सर्जरी में 1 घंटे 30 मिनट का समय लगा और ऑपरेशन के बाद कोई भी जटिलता उत्पन्न नहीं हुई।’ सर्जरी के बाद शिशु को एनआईसीयू में भेज दिया गया और 48 घंटे तक वैंटिलेटर पर रखा गया। जन्म के पाँचवें दिन से उसे गैस्ट्रिक आहार दिया जाने लगा। तब तक उसे नसों द्वारा एमीनो एसिड, फैट, कार्बोहाईड्रेट और इलेक्ट्रोलाईट्स दिया जा रहा था। सर्जरी के बाद मां और बच्ची दोनों स्वस्थ है।