गत वर्षों में देश में बेशक महिलाओं को अधिकार दिलाने वाले आंदोलनों की संख्या बढ़ी है। लेकिन जमीनी स्तर पर हालात नहीं बदल सके हैं। देश के एक चौथाई महिला-पुरुषों को अभी भी यकीन है कि घरेलू हिंसा की बड़ी वजह बेटियों की पैदाइश होती है। यह बात देश भर के 219 जिलों के 84 लाख से ज्यादा लोगों पर कराए गए सर्वे से साबित होती है कि पुरानी मान्यताओं में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है।
वैश्विक स्तर पर काम करने वाली संस्था ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में आधी आबादी के हालातों में अभी भी ज्यादा फर्क नहीं आया है। जहां महिलाओं को केवल बेटी पैदा करने पर घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। वहीं, 85 फीसदी महिला और पुरुष पत्नी की मर्जी के बगैर बनाए गए सेक्स यौन संबंध को सही मानते हैं।
इतना ही नहीं चौंकाने वाली बात एक और भी है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए किए गए तमाम प्रयासों और सख्त कानूनों के बावजूद पिछले एक साल में पति या परिवार के लोगों द्वारा होने वाली प्रताड़ना में 11.6 फीसदी का इजाफा हुआ है और खास बात यह कि ज्यादातर मामलों में महिलाएं पारिवारिक हिंसा का विरोध भी नहीं करती।
ऑक्सफैम रिपोर्ट में दिलचस्प यह कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलावों को कार्टून के जरिये दिखाया गया है। वहीं, करीब तीन मिनट की एक डाक्यूमेंट्री भी तैयार की गई है। जो इसको बेहद आसान और रोचक तरीके से समझने में मदद करती है।
खेती-किसानी में आधी आबादी आ रही आगे
रिपोर्ट में कुछ बातें महिलाओं की अग्रणी भूमिका पर भी इशारा करती हैं। इसके मुताबिक बेहतर जिंदगी की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ हो रहे पलायन से देश की खेती-किसानी में महिला मजदूरों की संख्या बढ़ रही है।
फिलहाल गांवों की 75 फीसदी महिलाएं खेती में लगी हुई हैं। जबकि पुरुषों की संख्या 59 फीसदी के करीब है। वहीं, शहरों की ओर हो रहे पलायन से से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी से बदलाव हो रहा है।
62.8 फीसदी महिलाओं का प्राथमिक पेशा खेती है। जबकि पुरुषों की संख्या 43.6 फीसदी है। खास बात यह कि एक तिहाई महिलाओं को इसकी एवज में पैसा नहीं मिलता।
सेहत पर पड़ रहा फर्क
रिपोर्ट के मुताबिक, खेती में भले ही महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। लेकिन ज्यादातर मामलों में यह उनके ऊपर अतिरिक्त भार साबित होता है। खेती-किसानी के अलावा महिलाओं को अपने घरों में पारंपरिक काम भी करने होते हैं। मसलन, चूल्हा-चौका, बच्चों की देखभाल, साफ-सफाई आदि। पुरुष सहकर्मी इन मामलों में महिलाओं का हाथ नहीं बंटाते। इसका असर महिलाओं की सेहत पर पड़ता है।