अस्पताल की मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. संगीता नांगिया ने जानकारी दी कि मेडिकल जगत में यह केस रेयर है। उन्होंने बताया कि 30 लाख में से एक बच्चा इस बीमारी का शिकार होता है। यह एक जेनेटिक बीमारी है और वैज्ञानिक भाषा में इसका नाम हार्लेक्विन इक्थीयोसिस है।
डॉ. संगीता के अनुसार जब शरीर में प्रोटीन और म्यूकस मेंब्रेन नहीं बनती है तो बच्चे की त्वचा बहुत सख्त और मोटी के साथ-साथ सफेद हो जाती है। यह रोग एबीसीए 12 जीन की खराबी की वजह से होती है।
इस जीन में खराबी की वजह से त्वचा के नीचे चर्बी नहीं बन पाती जिससे त्वचा कठोर और सूखी हो जाती है। बच्चे की आंख भी पूरी तरह से नहीं बन पाती। सबसे बड़ी बात तो ये कि अल्ट्रासाउंड में इस बीमारी के बारे में मालूम नहीं हो पाता। इस रोग से ग्रसित बच्चों की एक महीने में मौत हो जाती है।