राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में बनी बहुमंजिला इमारतें भूकंप रोधी नहीं है। नेपाल जैसी भूकंप की सूरत में 09 लाख से अधिक लोगों की मौत हो सकती है। देश में जो बिल्डिंग कोड है, वो भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का नहीं है।
इस बात का खुलासा एसोचैम (द एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया) ने अपने अध्ययन में किया है।
जिसे मंगलवार को एसोचैम के महासचिव डीएस रावत, नेशनल काउंसिल ऑन एमएसएमई के अध्यक्ष पीके जैन और मियामोटो इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक संदीप साह ने संयुक्त रूप से जारी किया। रिपोर्ट में नौ सूत्रीय रणनीति सुझाए गए।
एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि बीते दो दशक में 21.33 फीसदी की दर से बहुमंजिला इमारतों का निर्माण हुआ है। इसके लिए सरकार ने बिल्डिंग कोड बनाए, लेकिन इन कोड का कोई अमल नहीं हो रहा है।
जिसकी वजह से दिल्ली-एनसीआर की बहुमंजिला इमारतें भूकंप के लिए तैयार नहीं है। बहुमंजिला इमारतों में से तीन-चौथाई आवासीय क्षेत्र में है, जो भूकम्प के लिहाज से अत्यधिक जोखिम वाले जोन में आती हैं। नगर निगम, अग्निशमन सेवा तथा पुलिस जैसे स्थानीय प्रबंधन तंत्र भी संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
ऐसे में वे भूकंप तथा इमारतों में आग लगने जैसी मुश्किल परिस्थितियों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। जबकि यहां 6 से 15 माले की बहुमंजिला इमारतें अधिक है।
रिपोर्ट जारी करते हुए महासचिव रावत ने कहा कि नेशनल बिल्डिंग कोड (एनबीसी) ऑफ इंडिया के मुताबिक भूकंप के कारण नुकसान के जोखिम के लिहाज से रिक्टर पैमाने पर 9 से ज्यादा तीव्रता वाले भूकंप के झटके आ सकते हैं।
मियामोटो इंटरनेशनल के कंट्री हेड और प्रबंध निदेशक संदीप शाह ने भूकंप के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अलग गाइडलाइन जारी किया, लेकिन यह मकानों में पालन नहीं होता है।
जो बिल्डिंग कोड है, वो पुरानी हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय तकनीक और मॉडल के हिसाब से पूरा नहीं है। भूकंपीय खतरों के मद्देनजर सुरक्षित इमारतों का निर्माण सुनिश्चित कराने के लिये ऐसी संहिता बेहद जरूरी है।