उन्होंने बताया कि डीटीआई तकनीक के जरिए ग्लायोमा ट्यूमर को जानने के लिए 14 हाई ग्रेड ग्लायोमा ट्यूमर ग्रस्त मरीजों को तीन वर्ग में विभाजित कर एक खास अध्ययन किया गया, जिसे जर्नल ऑफ न्यूरो ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। इस दौरान ग्लायोमा ट्यूमर का अंश कॉपर्स कैलोसम (वह हिस्सा जो मस्तिष्क के दो भागों को जोड़ता है) में भी फैला हुआ दिखाई दिया, जो तेजी से मस्तिष्क के दूसरे हिस्से में भी फैल रहा था। इस शोध में 3 टेस्ला एमआरआई तकनीक का इस्तेमाल भी किया गया।
भारत में हर साल करीब 10 लाख मरीज
स्वास्थ्य से जुड़े विश्वसनीय आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल ग्लायोमा ट्यूमर के करीब 10 लाख मामले सामने आते हैं। इनमें से कुछ ही फीसदी मरीजों में ट्यूमर की पहचान समय रहते हो पाती है और उन्हें बचा लिया जाता है। डॉ. पारीक का कहना है कि डीटीआई तकनीक के जरिए ट्यूमर की पहचान जल्द होगी, जिससे उनके इलाज के लिए पूरा वक्त मिल सकेगा।