एम्स में स्वास्थ्य और बीमारी में माइटोकॉन्ड्रिया की भूमिका पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
-देशभर के वैज्ञानिकों, डॉक्टर, शोधकर्ताओं और छात्रों ने नई खोज पर की चर्चा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में स्वास्थ्य और रोग में माइटोकॉन्ड्रिया विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। मीटोकनेक्ट 2026 सोसाइटी फॉर माइटोकॉन्ड्रियल रिसर्च एंड मेडिसिन (एसएमआरएम) के सहयोग से आयोजित हुआ। अब वैज्ञानिकों ने पाया है कि माइटोकॉन्ड्रिया सिर्फ ऊर्जा नहीं बनातीं, बल्कि बीमारियों, उम्र बढ़ने, चयापचय और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं हैं। संगोष्ठी में देशभर से वैज्ञानिक, डॉक्टर, शोधकर्ता और छात्र शामिल हुए। उन्होंने माइटोकॉन्ड्रिया से जुड़ी नई खोज और भविष्य की दवाओं पर चर्चा की।
एम्स की चिकित्सा अधीक्षक प्रो. निरुपम मदान ने कहा कि माइटोकॉन्ड्रिया का अध्ययन आधुनिक चिकित्सा के लिए बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में और ज्यादा शोध की जरूरत है ताकि नई बेहतर दवाएं बन सकें। कार्यक्रम में मुख्य व्याख्यान सीसीएमबी, हैदराबाद के पद्मश्री डॉ. के. थंगराज ने दिया। इसके अलावा बीएआरसी, मुंबई के प्रो. संतोष संदूर, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणा पी. सिंह और निमहंस बेंगलुरु के डॉ. पी. गोविंदराज जैसे विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे।
कृति नेगी को प्रथम पुरस्कार
एम्स के डॉ. विक्रम सैनी ने बताया कि माइटोकॉन्ड्रिया को ठीक करने वाला एक सस्ता और आसान पोषण संबंधी तरीका तपेदिक (टीबी) के इलाज में मदद कर सकता है। डॉ. शेफाली गुलाटी ने ऑटिज्म और तंत्रिका संबंधी बीमारियों में माइटोकॉन्ड्रिया की भूमिका पर बात की।
समापन सत्र में तीन शोधकर्ताओं को पुरस्कार दिए गए। कृति नेगी को प्रथम, कंचन सैनी को द्वितीय और नीति शौकीन को तृतीय पुरस्कार मिला। एम्स के वैज्ञानिकों ने कहा कि ऐसे मंच भविष्य में नई खोज और बेहतर इलाज को बढ़ावा देंगे।