मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक गजट से युवाओं में नपुंसकता बढ़ रही है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सका तो आने वाले दिनों में और भी समस्या बढ़ेगी। एम्स में इलाज के आने वाले 15 से 20 फीसदी युवक-युवतियों में यह समस्या देखी जा रही है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की गाइनोकोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो. डॉ. अलका कृपलानी ने बताया कि मोबाइल, इंटरनेट, अधिक समय तक कंप्यूटर पर बैठने और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गजट केअधिक इस्तेमाल से नपुंसकता बढ़ रही है। मेट्रो शहर और आधुनिक जीवन शैली अपनाने वाले युवा-युवतियों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है।