फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस फिर तैयार

विज्ञापन
विज्ञापन
डॉ. महेश शर्मा द्वारा विधायक पद से इस्तीफा देते ही राजनीतिक गलियारों में गतिविधियां बढ़नी शुरू हो गईं। ज्यादातर राजनीतिक लोग मानते हैं कि लोकसभा और विधान सभा के चुनाव में वोटरों की सोच अलग होती है।
विज्ञापन


नोएडा का दूसरा विधायक बनने के सपने देखने शुरू हो गए हैं और संभावित उम्मीदवारों ने अपने आकाओंके यहां डेरा भी डालना शुरू कर दिया है।

दरअसल, नए परिसीमन में नोएडा नई विधान सभा बनी थी। 2012 के विधान सभा के चुनाव में पहली बार डॉ.महेश शर्मा भाजपा से विधायक बने थे, अब वह सांसद चुने जा चुके हैं।

पर सबसे ज्यादा भाजपाई क्यों परेशान?

सबसे ज्यादा भाजपा के उम्मीदार भागदौड़ कर रहे हैं। क्योंकि डॉ.महेश शर्मा अब सांसद बन चुकेहैं। बिना उनकी मर्जी के नोएडा का टिकट मिलना मुश्किल माना जा रहा है।

अभी तक जो नाम सामने आए हैं, उनमें वरिष्ठ नेता हरिश्चंद्र भाटी, युवा नेता मनोज गुप्ता, सुंदर सिंह राणा, पूर्व मंत्री नवाब सिंह नागर समेत दर्जनभर से ज्यादा नाम हैं।

चूंकि सपा की प्रदेश में सरकार है, इसलिए संभावित उम्मीदवारों को लग रहा है कि इस बार दो साल में ही चुनाव लड़ने का मौका मिल गया है।

बसपा के लिए लांइन लंबी हो सकती है

मुख रूप से सुनील चौधरी, अशोक चौहान (दोनों नेता पूर्व में प्रत्याशी भी रह चुके हैं) समेत कई दिग्गज नेता यहां चुनाव लड़ने वालों की लिस्ट में शामिल हैं।

बसपा के लिए भी इस बार लाइन लंबी हो सकती है, क्योंकि पूर्व में प्रत्याशी रहे ओमदत्त शर्मा समेत कई नेता टिकट की दावेदारी करेंगे।

रही बात कांग्रेस की तो वह इन दिनों बुरे दौर से गुजर रही है। लेकिन चुनाव लड़ने की बात आएगी तो डॉ. वीएस चौहान, रघुराज सिंह, कृपाराम शर्मा सहित कई नाम चर्चा में आने शुरू हो गए हैं।
विज्ञापन

इन्होंने तो पहले ही कर ली थी तैयारी

नोएडा सीट पर पहले से ही लोगों की नजर थी। अब विधिवत रूप से दावेदारी करने का मौका आ गया है। क्योंकि इसी साल में विधान सभा के उप चुनाव होने हैं।

लोकसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति काफी अच्छी रही है। लेकिन पिछले विधान सभा के चुनाव को देखें तो प्रदेश में सपा का वर्चस्व ही रहा था। इसलिए सपा मानती है कि लोकसभा और विधान सभा के चुनाव में काफी अंतर होता है।

विधान सभा में स्थानीय मुद्दे होते हैं जबकि लोकसभा में राष्ट्रीय। इसलिए भाजपा की चुनौती यह रहेगी कि उनकी सीट थी, आगे भी रहे।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें