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नहीं देखी होगी इतने खास प्रोजेक्ट की ऐसी बेकदरी

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अरावली की तलहटी में बसे गांवों में हरियाली लाने के लिए करीब दो दशक पहले बना अरावली प्रोजेक्ट फाइलों में दबकर रह गया है। अरावली को बचाने के लिए दावे तो बड़े-बड़े हुए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में यह एरिया कंक्रीट में तब्दील होता जा रहा है।
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पर्यावरण प्रेमियों की मानें तो वह दिन दूर नहीं, जब अरावली भी मलबे का ढेर ही नजर आएगा। भारत की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में प्रमुख अरावली पहाड़ियां सदियों से मनुष्य और मवेशियों की बर्बरता का शिकार रही हैं।

वन संपदा के अंधाधुंध दोहन के कारण करीब ढाई दशक पहले ही यह पर्वत श्रृंखला हरियाली से वंचित हो गई। इसके चलते यहां प्राकृतिक संपदा का अभाव और भूमि कटाव, सूखा, अकाल जैसी समस्याएं आ खड़ी हुई।
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यूरोप ने समझी थी इस सोने की कीमत

इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रदेश सरकार ने भारत सरकार और यूरोपीय आर्थिक समुदाय के सहायता से इन पथरीली पहाड़ियों को दोबारा से हरा-भरा करने के लिए 1990 में अरावली परियोजना का शुभारंभ किया था।

परियोजना के तहत गुड़गांव, फरीदाबाद, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और भिवानी के 293 गांवों की पंचायत भूमि पर हरियाली लाने का लक्ष्य था। 1999 तक इन गांवों में 30 हजार हेक्टेयर में पौधारोपण हुआ भी था, लेकिन इसके बाद यह योजना लटक गई।

राज्य वन विभाग की ओर से मंडल वन विभाग को पत्र मिला कि पौधारोपण समेत तमाम कार्य मनरेगा के तहत किए जाएं। इसके लिए वन विभाग को मुख्यालय से अनुमति लेनी होती है।

कहां अटकी है फाइल

फाइल तैयार करके चंडीगढ़ भी भेजी गई थी, लेकिन इसके बाद आज तक इस पर कुछ भी कार्रवाई नहीं हुई। वर्तमान में अरावली की पहाड़ियां दोबारा से दुदर्शा का शिकार हो रही हैं।

अत्याधिक चराई, अंधाधुंध कटाई और अवैध खनन की वजह से अरावली पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। चिंता की बात यह है कि शहरीकरण का विस्तार इतना अहम हो गया है कि अरावली को बचाने के जिम्मेदार ही इसे उजाड़ने पर आमदा नजर आते हैं।
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4 प्रतिशत रह जाएगी हरियाली

वन विभाग के अनुसार गुड़गांव और मेवात इलाके में अरावली में पहले आठ प्रतिशत तक हरियाली थी। अब यह छह प्रतिशत तक रह गई है। मास्टर प्लान पूरा होने के बाद हरियाली चार प्रतिशत से भी कम हो जाने की आशंका है। कुंडली-मानेसर-पलवल एक्सप्रेस वे को पूरा करने के लिए कई जगह पहाड़ी का सीना चीरा गया है।

मेवात और गुड़गांव के हिस्से में पहाड़ी को समतल तक सड़क बनाने का काम पूरा हो चुका है। ग्वाल पहाड़ी में अरावली का एक बड़ा हिस्सा सरकार ने विशेष आर्थिक जोन के लिए दे रखी है।

फॉरेस्ट ऑफ सर्वे की 2011 में जारी रिपोर्ट कहती है कि हरियाणा में केवल 0.9 प्रतिशत वन क्षेत्र है। गुड़गांव में बेहद घने जंगल का अब कोई वजूद ही नहीं है। गुड़गांव में केवल अल्प घने जंगल है, जिनकी संख्या 50 के लगभग है।
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