जिले में बढ़ रही जागरूकता व शिक्षा के चलते कई सामाजिक बुराईयों में कमी आई है। जिसमें शामिल एक बुराई बाल विवाह भी है। पिछले 3 साल का रिकॉर्ड उठा कर देखें तो यहां निश्चित तौर पर यह बुराई काफी कम हुई है। जबकि उससे पहले यहां बाल विवाह के मामले खूब देखे जाते थे। जिसके पीछे लोगों का अशिक्षित होना तथा रूढ़िवादी सोच एक बडा कारण रही। जो अब बदलने लगी है।
प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक जिले में वर्ष 2014 से लेकर अब तक केवल 37 मामलों की शिकायत सामने आई। जिनमें से जांच के दौरान 10 मामलों में लड़का व लड़की दोनों ही बालिग पाए गए। इस तरह केवल 27 मामले ही बाल विवाह के पाए गए। वर्ष 2014 में कुल 10 शिकायतें प्राप्त हुईं। वर्ष 2015 में इनकी संया बढकर 22 हुई।
लेकिन इनमें से 8 शिकायतें गलत पाई गईं और इसमें लडका व लडकी बालिग मिले। 2 मामलों में मुकदमा दर्ज हुआ। बाकी मामले आपसी मध्यस्थता से सुलझाए गए और नाबालिग लड़का व लड़की के परिजनों को समझाकर शादियां रुकवाई गईं। वर्ष 2016 में अब तक 5 शिकायतें प्राप्त हुईं, 1 शिकायत में लड़का-लड़की बालिग तथा 2 में आपसी मध्यस्थता से मामले सुलझाए गए। जबकि इससे पहले यहां बाल विवाह का खूब प्रचलन था।
महिला संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी मधु जैन का कहना है कि पिछले कुछ समय से शिक्षा के प्रति लोगों का ध्यान ज्यादा आकर्षित हुआ है। जिसके चलते उनमें जागरूकता आई है और बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई में कमी आई है। उन्हें जो भी शिकायत मिलती है, उस पर तुरंत कार्रवाई की जाती है। आपसी मध्यस्थता व मुकदमा दर्ज कराकर बाल विवाह को रोका जाता है।
कुछ समय पूर्व तक सोच यह रही है कि लड़की पढ़कर क्या करेगी, शादी के बाद घर का चूल्हा चौका ही तो करना है, ऐसे तर्क आम सुने जा सकते थे। जिसके चलते लड़कियों को पढ़ने की इजाजत नहीं थी। वहीं अच्छे शिक्षण संस्थान न होने व जागरूकता की कमी के चलते लडकों की पढ़ाई भी 10-12वीं तक ही सिमट कर रह जाती थी और तुरंत उनकी शादी कर दी जाती थी।