नगर निगम सदन ने भले मेट्रो फंडिंग को सशर्त मंजूरी दे दी हो, लेकिन तकनीकी पेंच इसमें अड़ंगा डाल सकता है। दरअसल, निगम ने हाल ही में पास किए सालाना बजट में न तो जमीनों से मिलने वाली 138 करोड़ की इनकम को शामिल किया है और न ही मेट्रो को दिए जाने वाले फंड का जिक्र किया।
नगर निगम अधिनियम की धारा-150 के मुताबिक दोनों को ही बजट में शामिल किया जाना अनिवार्य है। इन्हें बजट में शामिल किए बिना मेट्रो को फंड देना तकनीकी रूप से मुमकिन नहीं होगा।
नगर निगम के वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए पास किए गए बजट में अंतिम अवशेष सिर्फ32.92 करोड़ रुपये है। जब तक निगम के बजट में जमीनों से होने वाली 138 करोड़ की इनकम को शामिल नहीं किया जाएगा तब तक वह जीडीए को 90 करोड़ की पहली किस्त नहीं दे पाएगा।
ऐसे में सबसे पहले नगर निगम को बजट के आय-व्यय पक्ष में संशोधन कराने के लिए कार्यकारिणी समिति या सदन की बैठक दोबारा बुलानी होगी। उधर, निगम अधिकारी फिलहाल इस मसले पर कुछ भी प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं।