रणनीतिकारों की मानें तो अमूमन महिला प्रत्याशियों पर भ्रष्टाचार के आरोप कम लगते हैं। अगर राजनीतिक रूप से आरोप लगाए भी जाते हैं तो लोगों का जल्द विश्वास नहीं होता है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने ज्यादा से ज्यादा महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है।
एमसीडी चुनावों का बिगुल बज चुका है। सभी पार्टियां इन चुनावों में आम जनमानस का मूड़ परखने के लिए तरह तरह के सियासी हथकंडे अपना रहीं हैं। विशेष रूप से प्रत्याशी चयन के मामले में फूंक-फूंककर कदम उठाए जा रहे हैं। इस चुनाव में भाजपा ने दिल्ली के 50 प्रतिशत से अधिक वार्डों में महिला प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। जानकारों की माने तो यह कदम एंटी इन्कमवेंसी फैक्टर से निपटने के लिए उठाया गया है।
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आम आदमी पार्टी लगातार एमसीडी पार्षदों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है। कई वार्डों के लोग भी पार्षदों से नाराज हैं। इसे और एंटी इन्कमवेंसी फैक्टर को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इस बार 50 प्रतिशत से भी अधिक वार्ड में महिला प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है।
रणनीतिकारों की मानें तो अमूमन महिला प्रत्याशियों पर भ्रष्टाचार के आरोप कम लगते हैं। अगर राजनीतिक रूप से आरोप लगाए भी जाते हैं तो लोगों का जल्द विश्वास नहीं होता है। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने ज्यादा से ज्यादा महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। कुछ इसी तर्ज पर पिछले एमसीडी चुनाव में भाजपा ने एंटी इनकंबेंसी से बचने के लिए पुराने सभी पार्षदों का टिकट काट कर नये उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है। इस नीति से ही भाजपा एमसीडी में वापसी कर सकी। रणनीतिकार यह भी मानते थे कि पिछले चुनाव में भी आम आदमी पार्टी की लहर थी लेकिन भाजपा के एक दांव से एमसीडी में चित हो गई। इस बार देखना है कि महिला प्रत्याशी एंटी इनकंबेंसी को कितना रोक पाती हैं।