मैरिटल रेप यानी वैवाहिक दुष्कर्म अपराध है या नहीं इस पर दिल्ली हाईकोर्ट की दो जजों की बेंच का बंटा हुआ फैसला सामने आया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों जजों की राय एक मत नहीं दिखी इसी के चलते दोनों जजों ने अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए प्रस्तावित किया है।
गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने के मामले में पक्ष रखने के लिए बार-बार समय मांगने पर केंद्र सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई थी। अदालत ने केंद्र को समय प्रदान करने से इनकार करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ के समक्ष केंद्र ने तर्क रखा था कि उसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस मुद्दे पर उनकी टिप्पणी के लिए पत्र भेजा है। केंद्र के अधिवक्ता ने कहा कि जब तक इनपुट प्राप्त नहीं हो जाते, तब तक कार्यवाही स्थगित कर दी जाए।
पीठ के पूछने पर कहा कि अभी तक किसी राज्य सरकार से संचार पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। एसजी मेहता ने भी तर्क दिया था कि आम तौर पर जब एक विधायी अधिनियम को चुनौती दी जाती है तो हमने एक स्टैंड लिया। लेकिन वे वाणिज्यिक या कराधान कानून हैं। ऐसे बहुत कम मामले होते हैं जब इस तरह के व्यापक परिणाम मिलते हैं, इसलिए हमारा स्टैंड है कि हम परामर्श के बाद ही अपना पक्ष रख पाएंगे
अदालत भारतीय दुष्कर्म कानून के तहत पतियों को दी गई छूट को खत्म करने की मांग वाली याचिकाओं पर विचार कर रही है। उच्च न्यायालय ने सात फरवरी को केंद्र को वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण की मांग वाली याचिकाओं पर अपना पक्ष रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। केंद्र ने एक हलफनामा दायर कर अदालत से याचिकाओं पर सुनवाई टालने का आग्रह किया था, जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक दुष्कर्म का अपराधीकरण देश में बहुत दूर तक सामाजिक-कानूनी प्रभाव डालता है और राज्य सरकारों सहित विभिन्न हितधारकों के साथ एक सार्थक परामर्श प्रक्रिया की आवश्यकता है।
कब और क्या हुआ
महिला संगठनों को सुप्रीम कोर्ट से आस
दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने के मामले को कई संगठनों ने अधूरा फैसला बताया है जबकि महिला कार्यकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि उच्चतम न्यायालय इस मामले में अधिक समझदारी दिखाएगा। महिला कार्यकर्ताओं ने कहा है कि मौजूदा प्रावधान बलात्कार पीड़ितों की एक श्रेणी के खिलाफ भेदभावकारी है। अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की सदस्य कविता कृष्णन ने कहा है, कि उच्च न्यायालय का फैसला निराशाजनक है। कानूनी तौर पर यह बलात्कार पीड़िता पत्नियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण है।
मुझे उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय इस शर्मनाक कानून को हटाने के लिए जरूरी साहस और स्पष्टता दिखाएगा। महिला समूह सहेली ट्रस्ट की सदस्य वाणी सुब्रमण्यम ने सवाल किया कि अगर घरेलू हिंसा अपराध है, तो वैवाहिक बलात्कार किस प्रकार अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी महिला की शादी हो गई, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसने हमेशा के लिए सहमति दे दी है।
इस बीच बलात्कार विरोधी कार्यकर्ता योगिता भयाना इस बात को लेकर संतुष्ट हैं कि कम से कम वैवाहिक बलात्कार मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है। उनका मानना है कि मामले को उच्चतम न्यायालय भेज दिया गया है। उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है, कि इसे उच्चतम न्यायालय की पीठ के पास भेजा गया है, क्योंकि अब आदेश निष्पक्ष होगा।