भोजपुरी गायक, सिने अभिनेता से नेता बने मनोज तिवारी के भाग्य ने भाजपा सांसद बनने के साथ शानदार पारी खेली। पूरब के जनाधार को देखते हुए वह दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए, लेकिन अपने कार्यकाल में वह कोई मॉडल नहीं खड़ा कर सके।
नवंबर 2016 में भाजपा ने दिल्ली और बिहार में प्रदेश अध्यक्ष बदला था। नित्यानंद राय को बिहार की और मनोज तिवारी को दिल्ली की जिम्मेदारी मिली थी।
मंगलवार को मणिपुर में टिकेन्द्र सिंह, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव और दिल्ली में आदेश कुमार गुप्ता को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया।
2016 से 2020 तक मनोज तिवारी के कार्यकाल में सबसे बड़ी शिकायत उनकी संगठनात्मक क्षमता को लेकर ही थी। मनोज तिवारी, भाजपा के पुराने नेता विजय गोयल, सांसद रमेश विधूड़ी समेत अन्य नेताओं के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।
वहीं तिवारी कैंप के नेताओं का कहना है कि दिल्ली के पुराने नेता मनोज तिवारी का खुलकर सहयोग नहीं कर रहे हैं। इन सबसे इतर भाजपा में नेताओं की एक टोली और है।
इस टोली का मानना है कि मनोज तिवारी का पूरा ध्यान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष, अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर ही टिका रहता था।
तिवारी की लोकप्रियता पर कोई सवाल नहीं उठाता, लेकिन अधिकांश नेताओं का मानना है कि वह अपनी अभिनेता और भोजपुरी गायक की छवि से ऊपर नहीं उठ पाए।
मनोज तिवारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों पसंद करते हैं। मनोज तिवारी ने ही कभी खुद बताया था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई प्रत्याशियों को टिकट दिलाने का आग्रह किया।
उनमें से कुछ आज सांसद हैं। गोरखपुर के सांसद रवि किशन भी मनोज तिवारी के करीबी हैं। आजमगढ़ से दिनश लाल यादव उर्फ निरहुआ को भी मनोज तिवारी के कहने पर ही भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया था।
दिल्ली में प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री बीएल संतोष हैं। संतोष संगठन पर बारीक नजर रखते हैं। माना जा रहा है कि बीएल संतोष ने भी मनोज तिवारी को दूसरा कार्यकाल देने के संदर्भ में अपनी राय नहीं दी।
भाजपा के दिल्ली में छह सांसद और आठ विधायकों में भी मनोज तिवारी को चाहने वाले कम हैं। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद भी मनोज तिवारी का हश्र पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की तरह गुमनामी वाला नहीं होगा।