जो मामला हत्या की कोशिश संबंधी धारा में दर्ज होना चाहिए था, पुलिस ने उसे घातक हथियार से चोट पहुंचाने संबंधी धाराओं में दर्ज किया। इसके तहत दोषी पाए जाने पर मौत या आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। ऐसे मामलों में आरोपी को मजिस्ट्रेट कोर्ट जमानत नहीं दे सकती। दिल्ली में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अपने अधिकार से बाहर जाकर आरोपी को जमानत दी है। सेशन कोर्ट ने आरोपी की जमानत रद्द करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की है।
तीस हजारी अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अतुल कुमार गर्ग ने कहा कि पीड़ित के बयान व उसकी चोटों, पुलिस द्वारा हल्की धाराओं में मामला दर्ज करने और आरोपी के परिजनों द्वारा पीड़ित व उसके दोस्त को धमकी देने के तथ्यों के मद्देनजर आरोपी को जमानत नहीं मिलनी चाहिए थी। कोर्ट ने आदेश की कॉपी संबंधित मजिस्ट्रेट और एसएचओ को भेजने को कहा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने पुलिस के कामकाज पर उंगली उठाते हुए कहा कि मेडिकल जांच के बाद डॉक्टर ने एमएलसी के पिछले पन्ने पर सिर पर कई चोटों का जिक्र किया था। जांच अधिकारी ने जो एमएलसी पेश की, उसमें इन चोटों का जिक्र नहीं था। एमएलसी बनाने वाली डॉक्टर और चिकित्सा अधीक्षक ने गवाही में इन चोटों का जिक्र किया है।