विशेषज्ञों की माने तो सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर मानक से कई गुना अधिक पहुंच जाता है। यह सीधे फेफड़ों पर असर डालता है। इसके अलावा कोरोना के बाद वायरल फीवर की समस्या बढ़ी है। संक्रमित होने के बाद मरीज लंबे समय तक बीमार रहता है। कई मामलों में वायरल एक से दो माह तक परेशान करता है। युवाओं में धूम्रपान करने की आदत भी बढ़ी है जो फेफड़ों की समस्याओं को बढ़ा रहा है।
चार हजार रिपोर्ट का हुआ विश्लेषण
वर्ष 2024 में किए गए 4 हजार से ज्यादा स्कैन में करीब 29 फीसदी मामलों में फेफड़ों की संरचना में बदलाव दिखा। इसमें ब्रोंकाइटिस, इम्फाइसीमा, फाइब्रोसिस और ब्रोंकियल वॉल मोटी होना सहित दूसरी समस्या दिखी।
तीन में से एक में मिली समस्या
रेडियोलॉजिस्ट डॉ. हर्ष महाजन का कहना है कि बीते साल किए गए सीटी चेस्ट स्कैन से तीन में से एक मामलों में फेफड़ों में ऐसे बदलाव नजर आ रहे हैं जो पहले ज्यादातर बुजुर्गों में दिखते थे। इनमें से कुछ बदलाव स्थायी होते हैं। इसमें ब्रोंकाइटिस और शुरुआती इम्फाइसीमा शामिल है। अगर समय रहते इन बदलावों को न पहचाना जाए तो आगे चलकर ये गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। समय पर स्क्रीनिंग करवाने से समस्या जल्द पकड़ में आ सकती है।