आवास विकास परिषद की योजनाओं को खरीदार न मिलने के हालत से पूरे शहर का रीयल एस्टेट सेक्टर जूझ रहा है। हवाहवाई विकास की बुनियाद पर टिका शहर का रीयल एस्टेट सेक्टर मंदी से निकल ही नहीं पा रहा है।
2012 से 2014 के अंत तक प्रापर्टी की बिक्री में 50 फीसदी तक की गिरावट आ गई है। शहर में जमीन की ऊंची कीमतों, सर्किल रेट और निर्माण लागत में इजाफे के कारण मंदी में भी प्रापर्टी की कीमतें कम नहीं हो रहीं हैं।
मंदी के कारण शहर में 40 फीसदी नए प्रोजेक्ट्स की शुरुआत अटक गई है। सस्ती आवासीय योजनाओं को छोड़ दें, तो जीडीए तक को खरीदार नहीं मिल रहे हैं। जीडीए की मधुबन-बापूधाम योजना इसका बड़ा उदाहरण है।
यहां सस्ते फ्लैट्स तो बिक गए हैं, महंगे फ्लैट्स को अब तक पूरी तरह से खरीदार नहीं मिल सके हैं। नीलामी के जरिए संपत्तियों की बिक्री बढ़ाने के लिए जीडीए ने कई शर्तों में छूट दी है।
हवाहवाई दावों, इंफ्रास्ट्रक्टर और कीमतों ने बिगाड़ा खेल
एक दशक में शहर में इंदिरापुरम, कौशांबी, वैशाली, वसुंधरा, साहिबाबाद आदि में प्रापर्टी की डिमांड रही। इसी डिमांड को बिल्डरों ने मेट्रो, हाईस्पीड, मोनो रेल, एक्सप्रेस-वे, फ्लाईओवर, दिल्ली की तर्ज पर सुविधाओं आदि के हवाहवाई दावों से और उछाला।
इंफ्रास्ट्रक्चर के मोर्चे पर शहर नोएडा-दिल्ली से काफी पीछे रह गया। अब फ्लैट्स की कीमतें तो आसमान छू रहीं हैं, सुविधाएं नदारत हैं।
डिस्काउंट के ऑफर से भी नहीं बन रही बात
कई बिल्डर अप्रीशिएशन रेट (दो वर्ष में अनुमानित रूप से बढ़ी कीमत) से कम पर प्रापर्टी बेच रहे हैं, लेकिन खरीदार गायब हैं।
किसी बिल्डर ने इंदिरापुरम में कोई टू बीएचके फ्लैट 2012 में यदि 50-55 लाख रुपये में बेचा था, तो वह आज इसे 60-65 लाख रुपये में भी नहीं बेच पा रहा। जबकि अप्रीशिएशन के लिहाज से बिल्डरों ने इसकी कीमत करीब 70-80 लाख रुपये आंकी थी।