दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखकर ने मनीष सिसोदिया के बयान को तथ्यात्मक और कानूनी तौर पर गलत बताया है। उपराज्यपाल की तरफ से पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की जांच का आदेश देने के बाद उपमुख्यमंत्री ने 21 जून को उन्हें पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने जांच की अनुमति देने पर सवाल उठाया था। इसी कड़ी में अब उपराज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है।
दिल्ली सरकार के सात कोविड अस्पतालों के निर्माण में कथित तौर पर बरती जा रही अनियमितताओं की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) से जांच करवाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। प्रोजेक्ट से जुड़े पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की जांच कराने की उपराज्यपाल वीके सक्सेना की सिफारिश पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सवाल उठाया है।
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उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत जांच का आदेश देना चुनी हुई सरकार के अधीन आता है। उपराज्यपाल ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने इस तरह की टिप्पणी को प्रशासनिक कार्रवाई का राजनीतिकरण करार दिया है। उपराज्यपाल ने सिसोदिया के बयान को तथ्यात्मक और कानूनी तौर पर गलत बताया है। उपराज्यपाल की तरफ से जांच का आदेश देने के बाद उपमुख्यमंत्री ने 21 जून को उन्हें पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने जांच की अनुमति देने पर सवाल उठाया था। इसी कड़ी में अब उपराज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। इसमें उपराज्यपाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय के चार अगस्त, 2016 निर्णय का भी जिक्र किया है। पत्र में कहा गया है कि दिल्ली के शासन की सांविधानिक व्यवस्था के मुताबिक सेवाएं दिल्ली विधानसभा के दायरे से बाहर हैं। अदालत का यह निर्णय अभी भी प्रभावी है। वजह यह कि इस मसले पर निर्वाचित सरकार की ओर से दायर सिविल अपील पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ की ओर से सुनवाई बाकी है।
उपराज्यपाल ने यह भी कहा कि पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत की जांच करने की अनुमति सावधानीपूर्वक और सभी पहलुुओं को ध्यान में रखकर दी गई है। पत्र में उपमुख्यमंत्री के इस दावे पर भी हैरानी जताई गई कि मौजूदा उपराज्यपाल के पूर्ववर्ती की ओर से इस मामले को जांच के बाद बंद कर दिया गया था। कहा कि फाइल की नोटिंग से पता चलता है कि मामला कभी बंद नहीं हुआ। ऐसे में मामला फिर से खोल दिए जाने का दावा पूरी तरह गलत है। उन्होंने मुख्यमंत्री से गुजारिश की कि वह अपने मंत्रियों को ऐसे अनुत्पादक और खराब साक्ष्य वाले बयानों से दूर रहने की सलाह दें।
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पिछले उपराज्यपाल ने मामले की जांच की नहीं दी थी अनुमति
भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत जांच की अनुमति देना सेवाओं के दायरे में नहीं आता है। यह निर्वाचित सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। सरकारी के सूत्रों के मुताबिक, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम किसी भी सरकार को जांच की अनुमति देने के लिए अधिकतम चार महीने का समय देता है। उनका कहना है कि पिछले उपराज्यपाल ने उन चार महीनों में न तो इस पर जांच की अनुमति दी और न ही निर्वाचित सरकार से कोई सलाह मांगी। इससे साबित होता है कि तत्कालीन उपराज्यपाल ने इस शिकायत को जांच के उपयुक्त नहीं समझा था। मौजूदा उपराज्यपाल का अपने पूर्ववर्ती पर इतनी महत्वपूर्ण फाइल को गंभीरता से न लेने और निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्णय नहीं लेने का आरोप लगाना दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित है। अनिल बैजल अपने वैधानिक कर्तव्यों से अवगत थे। फाइल पर उनकी चुप्पी से साबित होता है कि उन्हें प्रथम दृष्टया शिकायत में कोई सच्चाई नहीं मिली। तथ्य यह है कि पिछले एलजी ने चार महीने की निर्धारित समय सीमा के भीतर इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। इससे यह साफ होता है कि उन्होंने इस मामले को कार्रवाई के लिहाज से गंभीर नहीं पाया।