दिल्ली की जनता और विभाग के मुखिया 15 साल सत्ता में रहीं शीला दीक्षित और 49 दिन के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल के फैसलों के बीच फंस गए हैं।
ऐसे दर्जन भर फैसले हैं, जिसे विभागों के मुखिया समझ नहीं पा रहे हैं कि कैसे उन्हें अमल में लाएं। कई फैसले तो ऐसे जो एक दूसरे के एकदम उलट हैं। अगर इनमें थोड़े बहुत बदलाव होते तो अमल में लाने को कोई परेशानी नहीं होती लेकिन एकदम उलट फैसलों पर कैसे एक्शन लिए जाएं यह एक बड़ा मुद्दा है। इन फैसलों की समीक्षा अब उप राज्यपाल नजीब जंग के दरबार में होगी।
मिलेनियम पार्क डिपो हटेगा कैसे, समिति बताएगी
आम आदमी पार्टी की सरकार ने 15 जनवरी को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के मिलेनियम पार्क डिपो हटाने की बजाय लैंड यूज बदलने के फैसले को बदल दिया था। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने फैसला किया था कि डिपो हटाया जाएगा। कोर्ट ने 9 महीने का टाइम दिया है। जमीन नहीं मिल रही है, ऐसे में क्या होगा?
राष्ट्रपति शासन लगने पर पहले दिन ही उपराज्यपाल नजीब जंग ने मिलेनियम डिपो का भविष्य तय करने को बैठक बुलाई। बैठक में तय किया गया कि परिवहन विभाग, डीडीए, डीटीसी, राजस्व विभाग के अधिकारियों की समिति बताएगी कि हटाने की प्रक्रिया क्या होगी, संभावनाएं क्या-क्या हैं।
रिटेल में एफडीआई पर सरकार की हां और ना
मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई पर शीला दीक्षित के फैसले को केजरीवाल सरकार ने 13 जनवरी को पलट दिया था। केन्द्र सरकार के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग(डीआईपीपी) को पत्र लिखकर साफ कह दिया है कि पुरानी सरकार ने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई की जो स्वीकृति जुलाई, 2012 में दी थी, उसे वापस लिया जाता है।
जबकि शीला दीक्षित ने एग्रीकल्चरल प्रोड्यूज मार्केटिंग कमेटी(एपीएमसी) एक्ट में संशोधन करके रिटेलर और किसान के बीच सीधे संपर्क की छूट देने की घोषणा की गई थी। अब हालात समझ से परे है। मामले पर दिल्ली के प्रशासक (उपराज्यपाल) अंतिम निर्णय लेंगे।
दिल्ली के मुख्य सचिव व अन्य विभागों के मुखिया
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 28 दिसंबर को कुर्सी संभाली और 9 जनवरी को मुख्य सचिव बदल दिया। मुख्य सचिव 1980 बैच के आईएएस संजय कुमार (एसके) श्रीवास्तव को बनाया गया। श्रीवास्तव ने 1979 बैच के आईएएस दीपक मोहन स्पोलिया की जगह ली है।
दीपक मोहन स्पोलिया अभी वित्त आयुक्त की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके साथ ही तमाम विभागों के मुखिया बदले गए। अब राष्ट्रपति शासन लगने से फिर डीएम स्पोलिया की वापसी और कई अधिकारियों के बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
विधायकों को नहीं मिल सकेगा वीआईपी नंबर
दिल्ली में वाहनों के वीआईपी नंबर आमजन के लिए वर्षों से बंद हैं। विधायक, आईएएस अधिकारी और सरकारी विभागों को फ्री में मिल रहे थे। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की कैबिनेट ने वीआईपी नंबरों की नीलामी का फैसला करने के साथ नेता और नौकरशाहों को फ्री में नंबर देने की व्यवस्था दी थी।
केजरीवाल सरकार ने फ्री में दिए जाने वाले नंबर पर रोक लगा कर फिर से कैबिनेट में प्रस्ताव लाने के लिए विभाग को निर्देश दिए थे। अब सरकार चली गई है तो इस पर भी अंतिम फैसला उपराज्यपाल को लेना है।
डीयू कॉलेज प्रबंध समिति चेयरमैन और सदस्य क्या करेंगे?
दिल्ली सरकार ने दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंद्ध सभी 28 कॉलेजों में प्रबंध समिति के लिए खुला आवेदन मंगाया। उसमें 250 आवेदन मिले जिसे अध्यक्ष और सदस्य बनाने की दिशा में सरकार आगे बढ़ी। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में प्रबंध समिति अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सभी सदस्य राजनीतिक स्तर पर मुख्यमंत्री बिना किसी आवेदन प्रक्रिया के तय करते थे।
अब बुद्धिजीवी, उच्च शिक्षा से जुड़े विशेष और कॉलेज एल्युमिनाई का क्राइटेरिया रखा गया। इसका विरोध डीयू प्रशासन की तरफ से किया गया। लेकिन अरविंद केजरीवाल सरकार अड़ी रही। अब सरकार नहीं तो इस प्रक्रिया पर भी ब्रेक की संभावना है।
दिल्ली में जनशिकायत कॉल सेंटर नंबर का क्या होगा?
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनता दरबार लगाया। भीड़ आई तो वहां से भाग निकले। फिर विभागों के बीच जन शिकायत के लिए पब्लिक ग्रिवेंस मैनेजमेंट सिस्टम (पीजीएमएस) शुरू किया। शिकायतें स्कैन करके विभागों में भेजी जाने लगी हैं।
वहीं कॉल सेंटर शुरू करने की न सिर्फ घोषणा हुई बल्कि चार अंकों का विशेष नंबर 1076 भी ले लिया। अभी तक 100 लाइन का कॉल सेंटर शुरू करने के लिए कैबिनेट में मसला नहीं आ सका। लेकिन ऑनलाइन शिकायतें आने लगी हैं। ऐसे में अब कॉल सेंटर और इन शिकायतों पर विभागों की प्रतिक्रिया कैसी रहेगी, इसका भविष्य में उपराज्यपाल ही तय करेंगे।
अनधिकृत कॉलोनी रजिस्ट्री, नियमन और विधायक फंड
दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियां चुनाव के सबसे बड़े एजेंडे में है। कांग्रेस सरकार ने 895 कॉलोनियों को नियमित घोषित करके निजी जमीन पर बनी कॉलोनियों में रजिस्ट्री की स्वीकृति भी दे दी थी।
लेकिन केजरीवाल सरकार ने उस दिशा में कुछ नहीं किया। अधिकारी डरे हुए हैं। वहीं स्वराज कानून लाए बिना विधायक फंड और भागीदारी फंड भी खत्म कर दिया। ऐसे में क्षेत्रीय विकास में इस्तेमाल होने वाले विधायक फंड और भागीदारी फंड का फैसला भी उपराज्यपाल के दरबार में ही होगा।