अरावली पहाड़ी क्षेत्र में वन्य जीवों पर खतरा मंडरा रहा है। अतिक्रमण का सिलसिला लगातार जारी है। इससे वन्य जीव अशांत हो रहे हैं। इलाके में भोजन एवं पानी का संकट भी तेजी से बढ़ रहा है।
इस वजह से भी वन्य जीव गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। साठ के दशक तक अरावली पहाड़ी क्षेत्र में काफी संख्या में तेंदुआ रहते थे। लोगों की हिम्मत नहीं होती थी कि वे इस पहाड़ी इलाके में प्रवेश कर सकें।
मारुति उद्योग के आने के बाद विकास की ऐसी आंधी चली कि देखते ही देखते अरावली पहाड़ी क्षेत्र में भी अतिक्रमण का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ वर्ष पहले वन विभाग गुडग़ांव के तत्कालीन वन संरक्षक डॉ. आरपी बालवान ने सुप्रीम कोर्ट सौंपी रिपोर्ट में चार हजार एकड़ से अधिक भूमि पर गैर वानिकी कार्य होने की बात कही थी।
इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने हजार एकड़ भूमि पर गैर वानिकी कार्य हो सकते हैं। इस वजह से धीरे-धीरे वन्य जीव कम होने शुरू हो गए। जहां पहले पूरे क्षेत्र में वन्य जीव दिखाई देते थे, वहीं अब केवल उन्हीं इलाकों में वन्य जीव हैं, जहां अधिक हरियाली है।
मांगर, रायसीना जोन के मानेसर इलाकों में काफी घनी हरियाली है। इस वजह से अधिकतर वन्य जीव इन्हीं इलाकों में रहते हैं। ये अब भोजन की तलाश में निकलने के दौरान कई बार भटक जाते हैं। जैसे ही सड़क पार करने की कोशिश करते हैं, मौत के शिकार हो जाते हैं।
इलाके में न भोजन है और न ही पानी
अरावली पहाड़ी इलाके में चारों तरफ मस्कट के पेड़ हैं। यही वजह है कि जब भी बंदरों या पालतू जानवरों को क्षेत्र में छोड़ा जाता है, वे भागकर फिर से रिहायशी इलाकों में चले जाते हैं। अस्सी के दशक तक इलाके में फलदार पेड़ भी थे।
इस वजह से पालतू जानवर भी रिहायशी इलाकों से भागकर अरावली के इलाके में पहुंच जाते हैं। अब स्थिति यह है कि वन्य जीव कई बार भोजन व पानी की तलाश में रिहायशी इलाकों में भागकर चले आते हैं।
भागने के दौरान कई बार वे पत्थरों से टकरा जाते हैं तो कई बार लोगों की पकड़ में आ जाते हैं। कुछ महीने पहले मानेसर के नजदीक स्थित एक तेंदुआ घायल मिला था। इससे पहले गोल्फ कोर्स में एक तेंदुआ मृत मिला था। कुछ ही दिन बाद तीन तेंदुए और मृत मिले थे। मामला पर्यावरण कोर्ट में है।
अब तक नहीं बन सका चेक डैम
अरावली के क्षेत्र में वन्य जीवों के लिए कई वर्षो से क्षेत्र में चेक डैम बनाने की बात चल रही है, लेकिन प्रदेश सरकार ध्यान देने को तैयार नहीं। चेक डैम बनने से जगह-जगह पानी जमा होता। पानी धीरे-धीरे नीचे जाता।
इससे जहां भूमिगत जल स्तर में सुधार होता, वहीं आसपास हरियाली बढ़ती। पर्यावरणविद् चेतन अग्रवाल कहते हैं कि भोजन से अधिक प्यास बुझाने के लिए तेंदुए या अन्य वन्य जीव रिहायशी इलाकों में भागते हैं। जिसकी वजह से यह इन इलाकों में दिखने लगे हैं।
कब-कब दिखा तेंदुआ
-13 जनवरी, 2015: सोहना के दमदमा इलाके में दिखा था तेंदुआ और शावक
-08 मई 2015: मांगर के पास सड़क पर तेंदुआ दिखा
-06 अगस्त, 2015: मानेसर के पास अरावली में तेंदुआ दिखने से मचा था हड़कंप
-जनवरी 2016 में गैरतपुर बास से सटे जंगलों में पेड़ से बंधा मिला था शावक।