राजनीति के क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण और उत्थान के दावे कुछ और हैं और हकीकत कुछ और। महिलाओं को ताकतवर बनाने की वकालत संसद और विधानसभाओं में होती है लेकिन राजनीति के क्षेत्र में ही महिलाएं सबसे ज्यादा पिछड़ी हैं।
भारतीय राजनीति में महिलाओं की कुल भागीदारी 10 प्रतिशत से भी कम है। गाजियाबाद की पांच विधानसभा सीटों पर कोई महिला विधायक नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी केवल दो महिला विधायक और चार सांसद हैं।
भारत में महिलाओं की संख्या लगभग आधी आबादी केकरीब ही है। लेकिन भागीदारी की बात करें तो हर क्षेत्र में महिलाएं आज भी पुरुषों से काफी पीछे हैं।
गाजियाबाद में कुल वोटर 20,28,650 लाख हैं इनमें 8,78,367 लाख महिला वोटर हैं। लेकिन आंकडे़ साफ बताते हैं कि ये महिलाएं सिर्फ वोटर ही हैं लीडर नहीं।
गाजियाबाद की पांच विधानसभा सीटों में से एक पर भी महिला विधायक नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो महिला विधायक और चार सांसद हैं।
इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो गाजियाबाद से कभी महिला सांसद नहीं चुनी गई है। लोकसभा में 59 महिला सांसद हैं तो राज्यसभा में 28 महिला सांसद हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में 32 महिला विधायक हैं। कुल मिलाकर 10 प्रतिशत से भी कम महिलाओं की भागीदारी राजनीति में हैं जबकि राजनीति में ही सबसे ज्यादा महिला कल्याण की बात की जाती है।
ऐसे में महिला सशक्तिकरण और महिलाओं के विकास की बात करना बेमानी है। राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी तो कुछ बात बनेगी।
आप ने खेला महिला पर दांव
लोकसभा चुनाव में गाजियाबाद लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी को छोड़कर किसी पार्टी ने महिला प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है। सभी ने पुरुषों पर दांव खेला है।
आम आदमी पार्टी ने पूर्व पत्रकार शाजिया इलमी को प्रत्याशी बनाया है। समाजवादी पार्टी ने स्थानीय नेता सुधन रावत को मैदान में उतारा है तो बसपा ने एमएलसी मुकुल उपाध्याय को टिकट दिया है। भाजपा ने जनरल वीके सिंह पर दांव खेला है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थिति
विधानसभा में महिला: हेमलता चौधरी (बागपत), विमला सोलंकी (सिकंदराबाद)
लोकसभा में महिला: बेगम तबस्सुम हसन (कैराना), जयाप्रदा (रामपुर), सारिका बघेल (हाथरस), राजकुमारी चौहान (अलीगढ़)