डीयू में फर्जी कागजात के जरिये प्रवेश कराने वाला गैंग बेहद शातिर है। पुलिस अधिकारियों की मानें तो इन लोगों ने फर्जी कागजात की पकड़ न हो इसके लिए यूनिवर्सिटी और कॉलेजों की नकली वेबसाइट बना रखी थीं।
फर्जी मार्कशीट और डिग्री की डिटेल यह लोग इन फर्जी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया करते थे। बेहद शातिर तरीके से इन लोगों ने वेबसाइट के ऐसे लिंक बनाए थे कि जब कोई भी उन यूनिवर्सिटी का नाम गूगल पर टाइप करता तो उनकी फर्जी यूनिवर्सिटी का ही लिंक पहले दिखाई देता।
कोई कॉलेज या नियोक्ता कागजातों की ऑनलाइन तहकीकात करता था तो वह इन फर्जी वेबसाइट से धोखा खा जाता था। आरोपियों ने खुलासा किया कि यह लोग यूपी, बिहार एमपी समेत कई अन्य राज्यों की यूनिवर्सिटी के कॉलेजों के फर्जी कागजात बनाते थे।
फर्जी कागजात से ऐसे कराते थे दाखिला
गैंग लीडर सुनील पंवार उर्फ गुरुजी और मो. जुबैर उन छात्रों का पता लगा लेते थे, जिन्होंने प्रवेश के लिए आवेदन किया लेकिन उनके नंबर कम हैं।
ऐसे छात्रों को भरोसे में लेकर सौदेबाजी कर उनका दाखिला कराने का आश्वासन दिया जाता था। छात्रों से डिटेल लेने के बाद जानकारी रंचित को दे दी जाती थी।
रंचित फौरन इस डिटेल को प्रवीन झा तक पहुंचाता था। प्रवीन डिटेल के आधार पर फर्जी कागजात तैयार कर देता था। सुनील ने खुलासा किया कि जिन छात्रों के नंबर थोड़े बहुत कम होते थे, उनके लिए यह नकली ओबीसी सर्टिफिकेट तैयार कर दाखिला करवा देते थे।
सुनील के मुताबिक एक दाखिले के लिए यह लोग तीन से सात लाख रुपये लेते थे। अब तक इन लोगों ने इस साल 25 दाखिले कराने का खुलासा किया है।
डीयू कर्मचारियों पर भी मिलीभगत का शक
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी इससे भी इनकार नहीं कर रहे हैं कि वारदात में डीयू के कुछ लोग भी शामिल हो सकते हैं। पुलिस ने चारों आरोपियों को सात दिन की रिमांड लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।
शुरूआती पूछताछ में आरोपियों ने खुलासा किया है कि यह तीन सालों से एडमिशन कराने का रैकेट चला रहे हैं। पिछले सालों में किस कॉलेज में कितने छात्रों के इन लोगों ने दाखिले करवाए, फिलहाल उसका पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।
कौन-कौन इनके साथी पूरे गोरखधंधे में भागीदार है, इसका भी पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।