सुप्रीम कोर्ट कोर्ट की तरफ से दिल्ली और केंद्र सरकार के विवाद पर चिंता जाहिर करने के अगले दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है।
पत्र में दिल्ली सरकार की तरफ से सहयोग करने का आश्वासन दिया है। प्रधानमंत्री से मतभेद भुलाकर जनता के हित में हिसाब में खुले दिमाग और प्राथमिकता के आधार पर समाधान निकालने का आग्रह किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि मतभेदों का हल निकालने की बातचीत के लिए मैं अतिरिक्त दूरी तय करने को तैयार हूं। मुझे नहीं लगता कि जनता के हित में करने वाली दो सरकारों के लिए ऐसा कोई मुद्दा नहीं, जिसे बातचीत से सुलझाया नहीं जा सके।
सात महीने के शासन की गिनवाईं दिक्कतें
तो वहीं पिछले सात महीने के शासन की दिक्कतें गिनवाते हुए कहा है कि 23 साल के दिल्ली के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसी स्थिति कभी नहीं आने का जिक्र किया है।
केजरीवाल ने लिखा है कि कोशिश कर रहे हैं कि जनता को दिक्कत न हो। विकास कार्य भी हो रहे हैं। मैं दिक्कतें सुलझाने केलिए तमाम मंत्रियों से मुलाकात की, आपसे मिला और दो बार राष्ट्रपति से भी मिला।
प्रधानमंत्री को तीन पेज के लिखे गए पत्र के शुरुआत में केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार के विवाद को लेकर डाली गई थी।
बातचीत से हल किया जा सकता है मामला
याचिका रद्द करने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि दो सरकारों का मामला है। जो बातचीत से हल किया जा सकता है। अगर दोनों सरकार समाधान नहीं निकालती हैं और शासन में दिक्कतें आती है तब जनता सही समय पर सही निर्णय सुनाएगी।
मैं सुप्रीम कोर्ट पीठ की तरफ से व्यक्त भावना से पूरी तरह सहमत हूं। उल्लेखनीय है कि केजरीवाल ने गत दिनों भी उपराज्यपाल कार्यालय से आए मेमोरेंडम के बाद एक पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखकर 2 महीने बाद लड़ाई की बात कही थी।
वहीं, सोमवार को कैबिनेट ने उपराज्यपाल की बात नहीं मानने और केन्द्र सरकार से कई पहलुओं पर राय का फैसला किया था।
पत्र में ये दिक्कतें गिनवाईं
मुख्यमंत्री ने पत्र में उपराज्यपाल को दिल्ली की भलाई के कार्य में बाधा बताया है। उन्होंने कहा है कि उपराज्यपाल ने पिछले छह महीने में चुनी गई सरकार के तमाम आदेश और सर्कुलर को अवैध करार दिए हैं।
चुनी गई सरकार के कई कानूनी और वैध आदेश को नहीं मानने के लिए सीधे अधिकारियों को सीधे विरोधाभाषी आदेश दिए। फिर गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार के आदेश को गैरकानूनी करार दिया।
इतना ही नहीं दिल्ली सरकार के सतर्कता विभाग के आधीन काम करने वाली भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को एक आदेश के सहारे पुराने नियमों का हवाला देकर उपराज्यपाल की तरफ से कब्जा जमा लिया गया।