पूर्व महालेखा परीक्षक वीके शुंगलू की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय कमेटी ने 404 फाइलों की जांच पड़ताल के बाद कहा है कि फरवरी, 2015 से सितंबर, 2016 के बीच आप सरकार की कैबिनेट ने करीब 300 फैसले किए जिसमें आधे से ज्यादा एजेंडा सीधे कैबिनेट रूम में टेबल पर आए।
जबकि विभाग से कैबिनेट का एजेंडा बनना चाहिए। तमाम एजेंडा मंत्री के हस्ताक्षर से सीधे कैबिनेट में रखा गया जबकि असाधारण मामलों में टेबल एजेंडा रखने की छूट सिर्फ मुख्यमंत्री को है।
रिपोर्ट के अनुसार हायर एजुकेशन क्रेडिट गारंटी फंड का कैबिनेट एजेंडा उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने रखा। इसमें कुछ पद भी सृजित किए जाने थे। लेकिन इसमें विभाग से प्रस्ताव का परीक्षण नहीं कराया, कानून व वित्त विभाग से सलाह तक नहीं ली गई।
एमएलए लैंड स्कीम खर्च के लिए दिल्ली अर्बन डेवलपमेंट एजेंसी गठन का एजेंडा भी राजस्व विभाग ने उपमुख्यमंत्री के निर्देश पर टेबल आइटम में लगाया जबकि ये शहरी विकास विभाग का मामला था। विभागों की राय को दरकिनार किया गया।
विभागों से बनाने की जगह मंत्री के हस्ताक्षर से रखा गया तमाम एजेंडा
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एंटी करप्शन हेल्पलाइन नंबर 1031 का फैसला भी कैबिनेट ने टेबल एजेंडा से किया था जबकि 10 करोड़ रुपये वार्षिक खर्च का अनुमान था। लोक निर्माण विभाग ने पूरी दिल्ली में सीसीटीवी लगाने, स्ट्रीट लाइट लगाने, रोड डिजाइन सेल बनाने, सड़क खुदाई मॉनिटरिंग समेत पांच टेबल एजेंडा एक साथ लगाए जबकि तमाम विभाग की राय इसमें जरूरी थी।
कमेटी के अनुसार, स्कूलों में एस्टेट मैनेजर नियुक्ति का कैबिनेट नोट 28 अक्तूबर 2015 को शिक्षा सचिव ने चलाया। वित्त, कानून, योजना, सेवा एवं प्रशासनिक विभाग से राय भी ली गई लेकिन उपराज्यपाल को मंजूरी के लिए नहीं भेजा गया और इसे टेबल आइटम बनाकर कैबिनेट में पास किया गया।
अनुबंधित कर्मचारियों को नियमित करने में रिक्त पदों पर काम करने वालों को आयु में छूट की पॉलिसी पर चर्चा करने के लिए दो बार कैबिनेट बैठी और नियम की नीति को पुन: गठन का फैसला किया।
तीन महीने वित्त, सेवा, योजना विभाग से राय में लगाए लेकिन उपराज्यपाल की अनुमति न लेनी पड़े इसलिए टेबल आइटम के तौर पर कैबिनेट में लाकर पास किया। स्कूलों में मोहल्ला क्लीनिक बनाने के कैबिनेट नोट मामले में उपराज्यपाल पहले ही संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दे चुके हैं।
कमेटी को समझ में नहीं आया कैबिनेट का टेबल आइटम
कमेटी ने कहा है कि जिस तरह के फैसले गए, उससे टेबल आइटम का मतलब समझ से परे है। यह ट्रांजेक्शन ऑफ बिजनेस रूल के नियम 13(3) के खिलाफ है क्योंकि इन मामलों में उपराज्यपाल को पूर्व सूचना नहीं मिली। यहां तक की कई मामलों में कानून व वित्त विभाग से राय तक नहीं ली गई। इन फैसलों की छंटनी होनी चाहिए।
बिना पद नियुक्त किया सीएम का पर्यटन सलाहकार
अरविंद केजरीवाल
शुंगलू कमेटी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि राहुल भसीन को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सलाहकार (पर्यटन) नियुक्त किया गया जबकि ऐसा पद नहीं था और भसीन सिर्फ 12वीं पास थे।
वेतन डेढ़ लाख रुपये मासिक रखे जाने के अलावा पर्यटन मंत्री के साथ इन्हें बर्लिन भी भेजा गया। इसमें कमेटी ने लिखा है कि यह गंभीर मामला है जिसमें मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव ने नोट चलाया। इसके अलावा म्यूनिसिपल टैक्सेशन ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक सदस्य के तौर पर परिजा पी की नियुक्ति भी बिना योग्यता के की गई।
वहीं स्वास्थ्य मंत्री सौम्या जैन की नियुक्ति 18 अप्रैल 2016 को की गई और 14 जुलाई को इस्तीफा दिया, इस बीच सवा लाख रुपये खर्च हुए। रोहित कुमार को चालक पद पर नियुक्ति दी गई जबकि लाइसेंस नहीं था, इसे मंजूरी नहीं देने की सिफारिश की गई है।
निकुंज अग्रवाल की स्वास्थ्य मंत्री के ओएसडी पद पर नियुक्ति करने से पूर्व चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में सीनियर रेजिडेंट पद पर नियुक्ति कर दी गई जबकि पद खाली नहीं था। बाद में इन्हें प्रबंधन ट्रेनिंग के लिए आईआईएम अहमदाबाद और विदेश यात्रा पर भी भेजा गया।
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केजरीवाल के करीबी गोपाल मोहन की नियुक्ति में कमेटी ने यह कहा है 10 अप्रैल 2015 को उपराज्यपाल की मंजूरी से एक रुपये मासिक मानदेय पर उन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार (एंटी करप्शन) नियुक्त किया गया।
इसके बाद 7 अगस्त, 2015 को मुख्यमंत्री के निजी सचिव ने गोपाल मोहन को भ्रष्टाचार निरोधक हेल्पलाइन का इंचार्ज बनाने का एक नोट चलाया। जन शिकायत सलाहकार का पद रिक्त है, जहां से वेतन मिलेगा।
यहां मानदेय 1 रुपये की जगह मासिक वेतन 1,15, 881 रुपये होंगे। 20 अगस्त, 2015 को मुख्यमंत्री की स्वीकृति के बाद इसे सामान्य प्रशासन मंत्री ने मंजूरी दे दी।
कमेटी ने इसे पीछे के दरवाजे से एंट्री करार देते हुए कहा कि उपराज्यपाल से मंजूरी नहीं ली गई। नई जगह गोपाल मोहन की नियुक्ति 16 सितंबर, 2015 को हुई लेकिन एक अक्तूबर को एक नोट जारी किया गया कि वो नौकरी 21 जुलाई से ज्वाइन करेंगे क्योंकि जन शिकायत के सलाहकार ने 17 जुलाई, 2015 को इस्तीफा दे दिया है।
एक रुपये की जगह मासिक वेतन 1,15, 881 पर किया नियुक्त
kejriwal
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सामान्य प्रशासन विभाग ने 12 मई, 2016 को एक आदेश जारी करके तारीख 7 अगस्त, 2015 दी। इनकी जन शिकायत सलाहकार की नियुक्ति बेहद अनियमित है।
ये एक तरह से हाथ की सफाई का मामला है। इस नियुक्ति को खत्म करके मुख्यमंत्री के तत्कालीन प्रधान सचिव से भुगतान की गई राशि वसूलने के आदेश दिए जा सकते हैं।
उधर, परिवहन मंत्री के ओएसडी अभिनव राय को यूडीसी के पद पर पहले नियुक्ति दी लेकिन बाद में 87 हजार रुपये मासिक वेतन पर ओएसडी बना दिया गया, जबकि मंत्री के पास ऐसा कोई पद नहीं था। अभिनव राय के खिलाफ पुलिस में एक मुकदमा भी दर्ज है।
ओएसडी की नियुक्ति सामान्य प्रशासन विभाग मंत्री ने दी और उपराज्यपाल के पास फाइल नहीं आई। ऐसे में अनुमति अब नहीं दी जा सकती। इतना ही नहीं टाइप-तीन मकान आवंटित कर किया जबकि यूडीसी को टाइप-एक आवंटित किया जा सकता है।