उन्हें केवल सेना से मामूली सी पेंशन मिल रही है और यह पेंशन भी उन्हें कई साल तक काफी संघर्ष करने के बाद मिलनी शुरू हुई, मगर पेंशन के सहारे वह अपना घर नहीं चला पा रहे हैं। कारगिल युद्ध के बाद वह सेवानिवृत्त कर दिए, लेकिन उन्हें पूरी पेंशन नहीं दी गई। वह काफी वर्षों तक इस संबंध में लड़ाई लड़ते रहे। उनके संबंध में संसद में भी मुद्दा उठा था।
वह बताते हैं कि उन्होंने घर चलाने के लिए पांच साल पहले गांव में जूस की दुकान खोली थी, लेकिन ढाई साल पहले कोरोना महामारी की दस्तक के कारण उनकी दुकान बंद हो गई। इसके अलावा युद्ध के दौरान पैर में गोली लगने के कारण वह अन्य कोई कार्य भी नहीं सकते है। वह बैसाखी के सहारे चलते है। उधर घर की आर्थिक स्थिति सही होने के कारण उनके बड़े बेटे ने पढ़ाई बीच में छोड़कर एक कंपनी में ड्राइवर की नौकरी करनी शुरू की है, जबकि उन्हें अपने छोटे बेटे को पढ़ाने में दिक्कत हो रही है।