-कुछ छात्रों,शोधार्थियों और प्रोफेसर ने जनमत संग्रह को लेकर उठाए सवाल
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ द्वारा कुलगुरु शांतिश्री डी पंडित को लेकर किए जनमत संग्रह को लेकर विवाद शुरू हो गया है। विश्वविद्यालय समुदाय के कुछ छात्रों, शोधार्थियों और प्रोफेसर ने जनमत संग्रह को कानूनी रूप से अमान्य, भ्रामक और नैतिक रूप से समझौता और छात्रों के वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने वाला बताया है। इस संबंध में जेएनयू के मुख्य प्रवेश द्वार पर प्रेस वार्ता का आयोजन भी हुआ। जेएनयू ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर क्रिस्टु दास ने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 के तहत जेएनयू कुलगुरु की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। किसी भी छात्र जनमत संग्रह के पास उन्हें हटाने या हटाने की सिफारिश करने का अधिकार नहीं है। विश्वविद्यालय का प्रशासनिक ढांचा केवल वैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही चलता है।
छात्र संघ द्वारा कराया जनमत संग्रह निष्पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मानकों पर खरा नहीं उतरता। इसके लिए कोई वैधानिक आधार, स्वतंत्र चुनाव प्राधिकरण या न्यूनतम भागीदारी की शर्त नहीं थी। इस प्रक्रिया में छात्रसंघ स्वयं प्रस्तावक, आयोजक और परिणाम घोषित करने वाली संस्था बन गया जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।