कश्मीर में एक सप्ताह तक प्राकृतिक आपदा का सामना कर 1800 लोग सोमवार को स्पेशल ट्रेन से दिल्ली पहुंचे। बाढ़ पीड़ित डरे सहमे थे। उनके चेहरे पर कारोबार छोड़कर आने का गम था।
इसके बावजूद उन्हें उम्मीद थी कि वे घर पहुंच जाएंगे। उन्हें चिंता सता रही थी कि जान बचाने की जद्दोजहद में वे त्योहारों के मौसम में खाली हाथ आ गए। उनका कहना था कि बाढ़ ने कमाई का पैसा भी लेकर आने का वक्त नहीं दिया।
तस्वीरें-आंखों के आगे तैर रहा जम्मू का वो खौफनाक मंजर!
घर पहुंचने की बेचैनी ऐसी कि दिल्ली पहुंचते ही उनकी नजर अपने-अपने स्टेशन की तरफ जाने वाली ट्रेनों पर टिक गई। अमर उजाला के फोटो जर्नलिस्ट विवेक निगम की फोटोग्राफी और संवाददाता नवनीत शरण की रिपोर्ट।
आनंद विहार स्टेशन पहुंची ट्रेन
जम्मू-कश्मीर में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ने के बाद यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल के रहने वाले करीब 1800 लोगों को लेकर एक ट्रेन दोपहर करीब 12:45 बजे आनंद विहार स्टेशन पहुंची। गुरुद्वारा शीशगंज के सहयोग से स्टेशन पर ही उन्हें खाना खिलाया गया। हालांकि बाढ़ पीड़ितों की शिकायत थी कि उनके लिए ट्रेन में खाने-पीने का कोई इंतजाम नहीं था। इसके बाद रेलवे ने गंतव्य तक पहुंचाने के लिए उन्हें दूसरी ट्रेन से भेजने का बंदोबस्त किया।
बदहवासी की हालत में ट्रेन से उतरे
बाढ़ पीड़ितों को लेकर जब ट्रेन स्टेशन पर रुकी तो यात्री इस आस में उतरने लगे कि उनका घर आ गया हो। बदहवासी की हालत में वे ट्रेन से उतरते दिखे। बाद में उन्हें समझाया गया कि वे अभी दिल्ली पहुंचे है। यहां से दूसरी ट्रेन यूपी और बिहार के लिए जाएंगी।
कुदरती कहर को बयां कर सहमे लोग
एक सप्ताह तक बाढ़ में फंसे रहे लोग कुदरती कहर को बयां करने में सहम रहे थे। उनका बस इतना कहना था कि चलो जिंदगी बच गई। बिहार के मधेपुरा शहर की तरकना परवीन ने बताया कि 7 सितंबर की रात से ही श्रीनगर में पानी भरना शुरू हो गया था और देखते-देखते पानी छत को छूने लगा। पानी में कई लोग बहते हुए दिखाई दे रहे थे। मौत को करीब से देख बच्चे भी घबरा गए थे। अगर कुछ देर और किश्ती नहीं मिलती तो जान नहीं बचती।
सैनिकों ने काफी मदद की
एक साल के बेटे के साथ स्पेशल ट्रेन से पहुंची छत्तीसगढ़ की रहने वाली गुड़िया का कहना था कि बाढ़ से बचने के लिए उन्हें 35 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। पैर में छाले पड़ गए। पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ा। गुड़िया ने बताया कि ऊधमपुर तक पहुंचने में सैनिकों ने उनकी काफी मदद की।
त्योहारों को लेकर चिंतित दिखे
बाढ़ पीड़ित किसी तरह जान बचाकर तो लौट आए हैं, लेकिन अब उन्हें त्योहारों की चिंता सताने लगी है। जगनारायण दास का कहना था कि उनकी एक साल की कमाई पानी में रह गई। वह जिस ठेकेदार के साथ मजदूरी का काम करते थे उसी के पास मजदूरी का पैसा रह गया। कुछ मजदूरों की शिकायत थी कि स्थानीय लोगों ने उनके साथ छल किया। अररिया (बिहार) के रहने वाले अनय तुला का कहना था ठेकेदार ने उनकी कमाई का पूरा हिस्सा भी नहीं दिया। ऐसे में वे त्योहार कैसे मनाएंगे।