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इनके लिए नहीं है गुनाह, यहां के मुस्लिम भी खेलते हैं होली

Thu, 10 Mar 2016 06:38 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, तावड़ू
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होली - फोटो : प्रतीकात्मक च‌ित्र
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इस्लाम धर्म में होली खेलना भले ही बहुत बडा गुनाह हो, लेकिन मेवात के मुसलमानों पर इसका कोई असर नहीं पडता। यहां के हजारों मुसलमान वर्षों से होली खेलते आ रहे हैं। जो यहां पर हिन्दू-मुस्लिम भाई चारे की मिसाल है।
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यहां का भाई चारा न तो राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का झगड़ा तोड पाया और न ही 1947 में देशका बटवारा। यहां के हिन्दू-मुसलमान एक दूसरे के त्यौहारों को मिलकर मनाते हैं। वहीं होली के हुडदंग का जमकर मजा लेते हैं।

मेवात जिला भले ही मुस्लिम बहुल क्षेत्र हो लेकिन यहां का आपसी भाई चारा सदियों पुराना है। यहां के मेव समाज के लोग अपने आप को सूर्यवंशी और कृष्णवंशी मानते हैं।  यहां के मुसलमानों  ने अंग्रेज, मुगलों को कभी अपना नहीं माना बल्कि हिन्दुस्तान के हिन्दू राजाओं के साथ मिलकर उनके खिलाफ जंग लड़ी।
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इतना ही नहीं होली पर एक सप्ताह तक चौपाई गाई जाती थी।

होली
क्षेत्र के गांव सिलखो, मसीत, मण्डारका, भाजलाक गांवों के बुजुर्ग हाजी जीत खां, अय्यूब, मुन्ना व जगगर, आदि ने बताया कि 1970 तक मेवात के अधिक्तर मुस्लिम समाज के लोग हिन्दुओं के साथ मिलकर होली खेलते थे।

इतना ही नहीं होली पर एक सप्ताह तक चौपाई गाई जाती थी। लेकिन आज कट्टरपंथियों की वजह से होली का त्यौहार सिमट कर रह गया है। होली पर आजकल शराब हावी होती जा रही है। जिसकी वजह से लोगों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है।
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पूर्व नगापालिका उपाध्यक्ष बाबूराम सैनी, समाजसेवी जगदीश मेंहदीरत्ता का कहना है कि मेवात क्षेत्र बृज के 84 कोस की परिधी में आता है। जिसकी वजह से यहां के सभी धर्मों के लोगों पर बृज का रंग चढ़ जाता है और यहां के लोग होली के रंग में रंग जाते है। उन्होंने माना कि लोग अब गुलाल की जगह ज्यादा कीचड़ से होली खेलते हैं जिसकी वजह से लोग अब अपने घरों में होली की रस्म अदायगी करने लगे हैं।
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