अदालत ने नवंबर 1984 दंगे मामले में आरोपी बनाए गए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर, उप-निरीक्षक व हेड कांस्टेबल सहित चार आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस मामले में आरोपी बनाए गए दो अन्य की ट्रायल के दौरान मौत हो गई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में चश्मदीद होने का दावा करने वाले मृतक के दो पुत्र, पुत्री व अन्य विश्वसनीय गवाह नहीं हैं और वे बार-बार बयान बदलते रहे हैं। इतना ही नहीं, अदालत ने इस बात पर भी संदेह जताया कि जिन लोगों की हत्या का दावा किया जा रहा है, उनकी हत्या हुई भी है या नहीं।
रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉक्टर कामिनी लाउ ने 20 सितंबर को दिए अपने 141 पृष्ठों के फैसले में कहा कि इस मामले में आश्चर्य है कि कथित रूप से मृतक स्वरूपसिंह के चार में से दो बेटे पत्नी गवाही देने के लिए अदालत में ही नहीं आए। इसके अलावा अन्य मृतकों के परिजन भी गवाही देने नहीं आए।
अदालत ने कहा कि गवाह ये भी नहीं बता पाए कि हत्या कब हुई, कैसे हुई, किस ने की। अदालत ने मुआवजे की आड़ में जिंदा लोगों को भी मृत दिखाकर हुई घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि जरूरी नहीं है कि मृतक जिंदा हों, लेकिन ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि उनकी हत्या हुई है।
अदालत ने कहा उनके न तो शव मिले ओर न ही उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट है। इसके अलावा मौत की समरी, फोटो, फोरेंसिक रिपोर्ट न होने से पूरा मामला संदिग्ध है। मृत्यु जन्म पंजीकरण का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है कि मृत्यु हुई।
इसके अलावा पीड़ितों ने हत्या की जानकारी संबंधित विभाग को 30 दिन के बाद दी। अदालत ने कहा कि पीड़ित ने कहा कि उन्हें कोई वित्तीय सहायता व मकान नहीं मिला जबकि साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मृतक की पत्नी व चार बेटों को सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि सभी पांच को मकान भी मिले हैं।
अदालत ने कहा कि आरोपी बनाए गए नांगलोई के तत्कालीन थानाध्यक्ष राम पाल सिंह राणा, उप-निरीक्षक दलील सिंह, हेड कांस्टेबल करम सिंह व सतपाल गुप्ता के खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला जिसके आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जा सके। अत: वे उन्हें बरी करती हैं। इस मामले में आरोपी प्रेम चंद जैन व राम निवास की ट्रायल के दौरान मौत हो गई। अदालत ने कहा कि इनके खिलाफ भी कोई साक्ष्य नहीं हैं।
पीड़ितों का मिला मुआवजा, लेकिन कहा नहीं मिला-
अदालत ने कहा कि मृतक स्वरूप के चार बेटे अमरजीत सिंह, गुरमीत सिंह, कुलदीप सिंह व गुरबचन सिंह व पत्नी प्रकाश कौर को तिलक विहार में पांच मकान आवंटित किए गए हैं। इसी प्रकार अमरजीत सिंह की पत्नी सतनाम कौर को भी मकान व आर्थिक सहायता मिली है। जबकि इन्होंने दावा किया था कि कुछ नहीं मिला।
मुआवजे के लिए जिंदा को मृत दिखाया
अदालत ने बचाव पक्ष द्वारा पेश उन तथ्यों को स्वीकार कर लिया कि मुआवजे के लिए जिंदा लोगों को मृत दिखाकर फर्जी मामले भी दर्ज करवाए गए हैं। अदालत ने कहा कि 2013 में झारखंड में 25 परिवारों द्वारा जिंदा लोगों को मृत दिखाकर डेढ़ करोड़ रुपये फर्जी दस्तावेजों से लेने का मामला प्रकाश में आया है। इसी प्रकार दिल्ली में भी 41 परिवारों द्वारा दो करोड़ 87 लाख रुपये के घोटाले का मामला सामने आया है और मामले में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है। वहीं असली पीड़ित अब भी मुआवजे के इंतजार में हैं।
बाल काटने का आरोप भी साबित नहीं
अदालत ने कहा कि गवाह गुरबचन सिंह व अन्य ने कहा कि थाने में जबरन बाल काटे गए जबकि गुरबचन की बहन व भाभी ने अपनी गवाही में कहा कि थानाध्यक्ष ने मात्र राय दी थी कि माहौल खराब है और जीवन की सुरक्षा के लिए अपने बाल कटवा लो। इसी आधार पर भाई ने बाल कटवाए। अदालत ने कहा कि बयानों से स्पष्ट है कि किसी के भी जबरन बाल नहीं काटे गए।