सेक्टर-62 स्थित पार्क एसेंट होटल में ‘भारतीय वस्त्र उद्योग में श्रमिकों के अधिकार एवं असमानता’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सेंटर फॉर ग्लोबल वर्कर्स राइट्स, पेंसिलवैनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के निदेशक डॉ. मार्क एनर ने कहा कि भारतीय परिधान उद्योग वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के मकड़जाल में उलझ गया है। इसकी मुसीबतें बढ़ती ही जा रही हैं। आज 60 प्रतिशत व्यापार वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (ग्लोबल सप्लाई चेन्स) के जरिए होता है।
रिपोर्ट से खरीदारों और सप्लायरों के बीच बढ़ते शक्ति असंतुलन का पता चलता है, जो कि बदले में कामगारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। शक्ति का यह असंतुलन कीमतों और परिधान के उत्पादन की शुरुआत से लेकर समाप्ति तक नजर आता है।
2016 में चोटी के पांच वैश्विक खरीदार कंपनियों के सीईओ और मालिकों की शुद्ध संपत्ति सभी भारतीय परिधान निर्यातों के कुल मूल्य 18 अरब डॉलर (करीब 1,26,000 करोड़ रुपये) से भी कहीं अधिक रही है।
सर्वेक्षण आधारित रिपोर्ट बताती है कि भारत में कपड़ा कामगारों की मजदूरी उनकी जीवन निर्वाह की जरूरतों के सिर्फ 23 प्रतिशत को ही पूरा कर पाती है। व्यापारिक आंकड़े बताते हैं कि 1994 से 2017 के बीच भारत से अमेरिका को निर्यात किए गए सभी परिधानों के लिए खरीदार डॉलर में जो असल कीमत चुकाते हैं, उसमें 62.81 प्रतिशत की गिरावट आई है।
2010 से 2017 के बीच, यूरोप को निर्यात किए गए सिंथेटिक कपड़े से बने ब्लाउजों की असल डॉलर कीमत 31.93 प्रतिशत तक घट गई। इसी तरह 2006 से 2018 के बीच, कॉटन की टी-शर्टों के लिए सभी ग्लोबल खरीदारों की ओर से डॉलर के रूप में चुकाई गई असल कीमत में 41.14 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस मौके पर चरन सिंह, एसके सिंह, मुकेश आदि मौजूद रहे।