12वीं की छात्रा सोनी चौहान की हत्या के बाद से सदरपुर गांव में उसके घर के आसपास सन्नाटा पसरा हुआ है। गांव का कोई भी व्यक्ति इस संबंध में खुलकर बात करने को तैयार नहीं है। जिन लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बात की, उन्होंने भी सोनी के पिता बिजेंदर सिंह चौहान की ही तारीफ की।
बताया कि वह शांत स्वभाव का और सभी से मिल-जुलकर रहने वाला शख्स है। उसके पास पुश्तैनी जमीन जायदाद है। गांव में उसका अच्छा रसूख है। बिजेंदर पहले किसी कंपनी में नौकरी करता था। फिलहाल वह कोई काम नहीं करता था। उसने कई कमरे बनाकर किराए पर दिए हुए हैं।
नोएडा में ऑनर किलिंग की ये पहली वारदात नहीं है। इससे पहले भी नोएडा-ग्रेटर नोेएडा में ऑनर किलिंग की दर्जनों वारदात हो चुकी हैं। हर बार लड़की के परिवार ने अपनी ही बेटी को मौत के घाट उतार दिया। कुछ मामलों में लड़की के परिवार वालों ने उसके प्रेमी की भी हत्या की है।
बेटे-बेटियों में फर्क है मुख्य वजह
honor killing in noida
- फोटो : अमित/अमर उजाला
समाजशास्त्री नकुल तरूण के अनुसार ऑनर किलिंग का आधार ही बेटे-बेटियों में फर्क है। अमूमन इस तरह की वारदात उन्हीं समाज में होती है, जहां बेटे-बेटियों में फर्क किया जाता है।
हालांकि कुछ मामलों में ऐसा देखने को मिला है कि बेटी को बेटे से ज्यादा चाहने वाले बाप ने मौत के घाट उतार दिया हो। इस तरह के मामलों में भी परिवार को लगने लगता है कि अगर बेटी ने किसी से प्रेम किया या प्रेम विवाह किया तो उनकी समाज में बहुत बेइज्जती हो जाएगी। जबकि इन्हीं समाज में लड़कों पर इतने कठोर प्रतिबंध नहीं दिखते हैं।
बच्चों को जिम्मेदारी का एहसास कराएं
मनोवैज्ञानिक केएल बंसल के अनुसार किशोरावस्था के बाद परिवार को बच्चों को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराना चाहिए। यह ऐसी आयु होती है जब बच्चे युवा हो रहे होते हैं और उनके दिशा भ्रमित होने की आशंका सबसे ज्यादा होती है।
ऐसे में बच्चों को सख्ती की जगह बड़े धैर्य से जिम्मेदारियों का अहसास कराते हुए समझाने की आवश्यकता होती है। उन्हें फायदे और नुकसान के बारे में बताएं। उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। दोस्ताना व्यवहार सबसे बेहतर होता है।
बच्चों के साथ क्या करें, क्या नहीं
honor killing in noida
- फोटो : अमित/अमर उजाला
-बच्चों की उम्र बढ़ने के साथ ही माता-पिता बच्चों की मर्जी को भी समझें।
-हर दिन उनसे बात करें, उनके सवालों का सही जवाब दें।
-बच्चे किस संगत में हैं, इसका भी ध्यान रखें, क्योंकि गलत संगत का प्रभाव जल्दी पड़ता है।
-बच्चों को किसी के भरोसे पर मत छोड़े, क्योंकि भटकने का डर बना रहेगा
-छुट्टी होने पर बच्चों को खुद ही घुमाने ले जाएं, किसी के साथ भेजने में धोखा मिल सकता है।
-मोबाइल, लैपटॉप व टीवी देखना बच्चों के लिए उतना ही ठीक है, जितनी जरूरत हो।
-घर में कौन आता है, इस पर भी माता-पिता को ध्यान रखने की जरूरत है
-बच्चे जिद भी करेंगे लेकिन वहीं चीज दिलाएं जो उनके फायदे की हो
-12 से 20 साल तक नजर रखनी है, इसके बाद बच्चे भला-बुरा मेें भेद समझने लगते हैं।