दिल्ली की आबादी अब लगभग दो करोड़ के आसपास पहुंच गई है। जगह के अनुपात में यह बहुत ज्यादा है, इसके लिए ढांचागत सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए। लेकिन सच्चाई यह है कि दिल्ली के पास बेहद कम मात्रा में जमीन है, जिस पर अब किसी तरह का ढांचागत विकास किया जा सकता है।
दिल्ली की जमीन का एक बड़ा हिस्सा यमुना बाढ़ क्षेत्र, लुटियन क्षेत्र, ऐतिहासिक इमारत क्षेत्र, वन क्षेत्र और सैन्य गतिविधयों के कारण घिरा हुआ है। इन जगहों पर कोई नया स्थाई निर्माण नहीं किया जा सकता। इन क्षेत्रों को निकाल देने के बाद दिल्ली के पास बेहद कम भू-भाग बचता है जिस पर किसी तरह का ढांचागत विकास किया जा सके।
दिल्ली में 1731 से अधिक अवैध कॉलोनियां हैं। ये ज्यादातर यमुना बाढ़ क्षेत्र, बड़े नालों के आसपास और सरकारी जमीन पर बसी हैं। इनके कारण नालों के अंदर कूड़े का भराव हो जाता है और वर्षा के जल का निकलना बेहद मुश्किल हो जाता है। इनके कारण भी इन इलाकों में कोई ढांचागत विकास भी नहीं किया जा सकता।
शहरी मामलों के विशेषज्ञ जगदीश ममगांई ने अमर उजाला से कहा कि दिल्ली के ऊपर आबादी का बड़ा बोझ है, लेकिन उसके पास ढांचागत विकास के लिए कोई जमीन नहीं है। यही कारण है कि केवल दिल्ली को दृष्टि में रखकर इसका उचित विकास नहीं किया जा सकता।
उनका कहना है कि दिल्ली को बाढ़ से बचाने के लिए अब दिल्ली-एनसीआर बोर्ड की कल्पना को साकार करना पड़ेगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के आसपास के इलाकों को एक साथ लेकर एक विशेष बोर्ड का गठन करना पड़ेगा। इसी बोर्ड को पूरे एरिया के विकास की जिम्मेदारी देनी चाहिए, तभी 2050 के भविष्य की जरूरतों, चुनौतियों को ध्यान में रखकर इस इलाके का सही विकास किया जा सकेगा।
दिल्ली-एनसीआर बोर्ड को सभी प्रकार के अधिकार दिए जाने चाहिए, जिससे इसके कार्य में कोई राजनीतिक हस्तक्षेप न हो सके। अन्यथा बोर्ड एक योजना को पास करेगा, तो उसकी औपचारिक अनुमति के लिए संबंधित राज्य सरकार से अनुमति मिलने में ही बहुत समय निकल जाएगा और अपेक्षित लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा।
दिल्ली पर आबादी का दबाव कम करने के लिए रोजगार के अवसरों और बड़े-बड़े संस्थानों के दफ्तरों को एनसीआर एरिया में स्थापित किया जाना चाहिए। नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद बेहतर विकल्प बन सकते हैं। इससे सभी क्षेत्रों का विकास होगा, योजनाओं में तेजी आएगी और एक जगह पर आबादी का दबाव कम होगा। इससे भी दिल्ली पर दबाव कम होगा।
दिल्ली की प्लानिंग के लिए 1962 में पहली योजना बनी थी। इसके बाद 1990 और 2007 में भी योजना बनी। इस समय 2041 की योजना पर काम चल रहा है। लेकिन अभी से इसकी सफलता पर सवाल खड़े होने शुरू हो गये हैं, क्योंकि विशेषज्ञ अभी से इसकी क्षमता को लेकर सवाल खड़े करने लगे हैं।
सीटीआई के चेयरमैन ब्रजेश गोयल ने कहा कि दिल्ली में भारी संख्या में व्यापारियों की आबादी रहती है, लेकिन 2041 के मास्टर प्लान में स्टोर हाउस बनाने का कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है। इससे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ेंगी और यहां व्यापारिक गतिविधियां चलाना मुश्किल हो जाएगा।